औषधीय गुणों का राजा लिंगुड़ा

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 लिंगडा़ 

उत्तराखंड को प्रकृति ने वरदान में अनेकों नेमतें दी हैं जिनमें प्राकृतिक सौंदर्य के साथ साथ औषधीय गुणों वाली वनस्पतियां भी प्रचुर मात्रा में दी हैं।  रामायण में संजीवनी बूटी का हिमालय पर्वत पर होना और मूर्च्छित हुए लक्ष्मण को फिर से जीवन देने की कथा से सभी  अवगत हैं। ऐसी ही कुछ वनस्पतियों में एक लिंगुड़ा-लिंगड़ा-लिंगड-ल्यूड के नाम से जाने जानी वाली वनस्पति के बारें में बताते हैं।  ये प्राकृतिक वनस्पति रोग प्रतिरोधक वनस्पति के रूप में जानी जाती है इस वनस्पति का उपयोग सब्जियों  के रूप में किया जाता है। लिंगुड़ा का उपयोग करके रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। 

दुनिया भर में लिंगड़ा की लगभग 400 प्रजातियां पाई जाती हैं। यह समुद्रतल से 1900 से 2900 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। लिंगड़ा समस्त एशिया के पर्वतीय क्षेत्रों में नमी वाले स्थानों पर पाया जाता है व भारत के लगभग सभी हिमालयी राज्यो में पाया जाता है। इसको उत्तराखंड में लीगुड़ा, लीगड़ा , ल्यूड आदि नामों से जाना जाता है। लिंगुड़ा को हिमांचल राज्य में लिंगरी,  सिक्किम में निगरु, असम में धेनकिर साक आदि नामो से जाना जाता है। लिंगुड़ा का वानस्पतिक नाम डिप्लॉज़िम एस्क्युलेंटम ( Diplazium esculentum ) है। यह Athyriaceae वर्ग का खाद्य फर्न है।

 हिमालयी राज्यो के नम क्षेत्रों स्वतः उगने वाली  वनस्पति फर्न लिंगुड़ा में भरपूर विटामिन्स और मिनरल पाए जाते हैं। लिंगड़ा में कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन , प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर और विटामिन सी, विटामिन बी काम्प्लेक्स, मिनरल्स, जिंक आदि अनेको पोषक तत्व पाए जाते हैं। लिंगुड़ा में कोई फेट नहीं पाया जाता है और इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं ।

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लिंगुड़ा के अनेक औषधीय गुण हैं इसके प्रयोग से निम्न लाभ स्वास्थ्य के मिलते हैं -

1- रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक -

आम जनमानस को कोरोना काल  के समय रोगप्रतिरोधक क्षमता शरीर के लिए आवश्यक है  करके शरीर  प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाया जा सकता है की समझ बनी।  कोरोना काल  जब बाजार में लोग बीमारी डर से बहुत कम निकल रहे थे तो  उस समय उच्च हिमालयी क्षेत्रों लोग लगातार लिंगुड़ा का प्रयोग कर स्वस्थ जीवन का आनंद ले रहे थे। कोरोना काल में उच्च पहाड़ी क्षेत्रों में कोरोना का प्रभाव ना बराबर हुआ इसका कारण यहां का पारम्परिक भोजन और रोजमर्रा की दिनचर्या में शामिल कार्यों  निष्पादन रहा है।  

लिंगुड़ा मुख्य रूप से अप्रैल मई व जून माह तक पाया जाता है।  लिंगड़ा प्राकृतिक रूप से  रोग प्रतिरोधक गुणों से संपन्न है। स्वास्थ्य विभाग के द्वारा रोग प्रतिरोधक बढ़ाने के लिए  जिंक की और विटामिन सी की गोलियां खाने की सलाह दी जाती  रही हैं। वही लिंगड़ा में जिंक और विटामिन सी भरपूर मात्रा में मिलता है।  लिंगुड़ा में एंटीऑक्सीडेंट गुणो के होने से यह सशक्त रोग प्रतिरोधक खाद्य पदार्थ बन जाता है। प्राकृतिक रूप से तैयार वनस्पति का प्रयोग करके कॉरोनकाल जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण है हिमालयी क्षेत्रों में इसका अधिक प्रयोग हुआ जिसका परिणाम सुखद रहा।

2- मधुमेह , कैंसर, लिवर की समस्या, त्वचा रोगों मे, उच्च रक्तचाप व गठिया और हड्डी रोग  में लाभ जैसी समस्याओं का रामबाण उपाय - 

लिंगड़ा की कोमल डंठल में, एंटीऑक्सीडेंट गुणो की भरमार होती है।  लिंगुड़ा में फ्लेवोनॉयड्स तथा स्टेरोल के कारण यह औषधीय गुणो की खान  है। त्वचा में होने वाली फोड़े फुंसियों एवं जख्म के लिए लिंगड़ा की जड़ों को प्रभावित जगह पर लगाने से लाभ मिलता है।  

लिंगुड़ा में भरपूर मात्रा में कैल्शियम होने के कारण यह हड्डी रोगों में लाभदायक होता है ।  लिंगड़ा  रक्त में शर्करा की मात्रा को ठीक करती है। लिंगड़ा में वसा और कैलेस्ट्रोल नही होता है। इसलिए इसकी सब्जी उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए बहुत ही लाभदायक सिद्ध होती है। 

 आजीविका का साधन बन सकता है लिंगुड़ा -

लिंगुड़ा को प्रकृति के द्वारा उपहार के रूप में उच्च हिमालयी क्षेत्रों को दी गयी  औषधीय गुणों से भरपूर वनस्पति है। इसका प्रयोग सब्जियों और अचार के रूप में किया जाता है। औषधीय गुण होने का प्रचार प्रसार सरकारी प्रयासों से हों और लिंगुड़ा से बने उत्पाद का उत्पादन यहां के स्वरोजगार करने के इच्छुक युवा वर्ग या स्वयं सहायता समूहों आदि के माध्यम से किया जाए तो व्यापारिक रूप इसका प्रसंस्करण करने के बाद अच्छा रोजगार का  साधन बन सकता है। 

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