श्री बद्रीनाथ यात्रा दर्शन- नारायण पर्वत पर अवस्थित तीर्थ

हिमालय क्षेत्र के पांच खण्डों का वर्णन,तप्तकुण्ड (अग्नितीर्थ),'मातामूर्ति",इन्द्रधारा,
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 श्री बद्रीनाथ यात्रा दर्शन- नारायण पर्वत पर अवस्थित तीर्थ

यात्रा दर्शन के इस भाग में नारायण पर्वत पर अवस्थित तीर्थों के क्रम में आदिकेदारेश्वर, अग्नितीर्थ आदि का वर्णन है। कुछ तीर्थों का संक्षिप्त परिचय मात्र है। प्रसंगानुसार समय समय पर विस्तार पूर्वक चर्चा होती रहेगी।

॥ ''आदिकेदारेश्वर'' ॥

सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र भगवान शिव का क्षेत्र है। हिमालय क्षेत्र के लगभग सभी गांव व कस्बों में प्राचीन शिव मंदिर बहुलता से स्थित हैं। हिमालय क्षेत्र के पांच खण्डों का वर्णन आता है।
''खण्डा पञ्च हिमालयस्थ प्रोक्ता नैपाल कूर्माचलौ।
केदारोऽथ जलन्धरोथरुचिरः काश्मीर सञ्ज्ञाऽन्तिमः॥"
हिमालय के पांच खण्ड(भाग) कहे गए हैं। नेपाल, कू्र्माचल (कुमाऊं), केदार, जलन्धर व कश्मीर। इन पांचों खण्डों पर शिवजी का आधिपत्य था। बदरीनाथ क्षेत्र में ब्रह्मा जी का सिर भगवान शिव के हाथ से छूटने के बाद भगवान यहीं विराजमान हो गए। यह क्षेत्र कैलाश के समीप ही स्थित है। भगवान विष्णु ने छलपूर्वक शिव से यह भूभाग छीना था। इसकी कथा इस प्रकार है। भगवान विष्णु ने एक शिशु का रुप धारण किया और शिव व पार्वती के मार्ग में बैठकर रोने लगे।पार्वती का वात्सल्य भाव जागृत हुआ। उन्होने शिवजी से  इस शिशु को आश्रय प्रदान करने के लिए कहा। शिवजी भगवान विष्णु की माया को समझ गए थे। इस कारण उन्होनें पार्वती को शिशु को छोड़ आगे चलने को कहा। परन्तु मातृत्व का भाव एक शिशु को भूख प्यास व शीत से व्याकुल कैसे देख सकता था? पार्वती जी ने उस मायावी शिशु को अपने निवास पर रख दिया। जब दोनों वापस आए तो उन्होने विष्णु  को चतुर्भुज रुप में विराजमान देखा। अपने घर पर कब्जा हुआ देख शिवजी पार्वती की ओर देख हंसते हुए बोले चलो अब यंहा से दूसरी जगह। भगवान शिव बदरी के पास में ही स्थित नीलकण्ठ के दूसरी ओर केदारनाथ चले गए।
परन्तु अंशरुप में बदरी क्षेत्र में भी विराजमान रहे। शिव के इस रुप को आदिकेदारेश्वर कहा जाता है।
''श्री तत्र केदाररुपेण ममलिङ्ग प्रतिष्ठितम्।
केदार दर्शनात् स्पर्शा दर्शनात् भक्तिभावतः॥
कोटिजन्मकृतं पापं भस्मी भवति तत्क्षणात्।
कलामात्रेण तिष्ठामि तत्र क्षेत्रे विशेषतः॥"
(स्कन्दपुराण )
भगवान शिव अपने पुत्र स्कन्द से कहते हैं -हे स्कन्द! वंहा(बदरीक्षेत्र) में मेरा केदार नामवाला लिङ्ग स्थित है। उस लिङ्ग का जो भक्तिभावपूर्वक स्पर्श, दर्शन व पूजन करते हैं उसके कई जम्मों के पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं। हे पुत्र ! मैं वंहा कलारुप (अंशरुप) में ही रहता हूँ।
भगवान शिव का आदिक्षेत्र होने के कारण ही यंहा पहले आदिकेदारेश्वर का दर्शन पूजन करने का विधान है। तप्तकुण्ड व मंदिर के मध्य स्थित इस मंदिर के दर्शन स्नान कर मंदिर जाते हुए स्वतः ही हो जाते हैं। बदरीनाथ जी के कपाट बन्द होने की प्रक्रिया में इनको भात का भोग प्रदान किया जाता। इसके पश्चात् सर्वप्रथम आदिकेदारेश्वर के कपाट शीतकाल हेतु बन्द किए जाते हैं। फिर कपाट बन्द होने की  अन्य प्रक्रियाएं प्रारम्भ की जाती हैं।


॥''ब्रह्मकपाल''॥

''तस्योपदेष्टमादाय बदरी समुपागतः तत्क्षणात् ब्रह्महत्वा मे वेपमाना मुहुर्मुहुः अन्तर्हित कपालं तत्करात् विगलितं मम॥"

(स्कन्दपुराण बदरीमहात्यम्)
ब्रह्माजी पञ्चमुखी थे। उनका एक सिर भगवान शिव ने काट दिया था। इसके अलग अलग कारणों का पुराणों में उल्लेख आता है। कहीं कथा आती है कि, ब्रह्मा जी ने जिस मुख से अपनी पुत्री जिसका नाम सरस्वती था को गलत दृष्टि से देखा। उस सिर को भगवान शिव ने काट दिया था। कहीं ओर कथा आती है कि इस पांचवें मुख से ब्रह्मा जी ने शिव की हंसी उड़ाई। पद्मपुराण के अनसार ब्रह्मा के पांचवे मुख ने सब देवताओं की शक्ति व तेज अपने में समाहित कर लिया था। देवताओं के कहने पर शिव ने इससे क्रोधित होकर ब्रह्माजी के उस पांचवे मुख को काट उनको चतुर्मुखी बना दिया। ऐसी ही बहुत सी कथाएं आती हैं। कारण अलग -अलग उल्लिखित हैं। परन्तु सिर काटने वाले सब पुराणों के अनुसार शिवजी ही थे। ब्रह्माजी का सिर काटने के पश्चात् उनका वो सिर शिव के हाथ से चिपक गया। ब्रह्महत्या विकराल रुप धारण कर शिव के पीछे लग गई। क्रोध में भरे ब्रह्मा जी ने भी एक विकराल पुरुष को उत्पन्न कर शिव को मारने की आज्ञा दी। एक ओर ब्रह्महत्या और दूसरी ओर वो विकराल पुरुष।  कर शिवजी के पीछे पड़ गई। सम्पूर्ण लोकों का चक्कर मारने के बाद वे भूवैकुण्ठ में पंहुचे। भगवान ने ब्रह्महंता होने के कारण शिवजी के कमण्डुल में अपने दाहिनी भुजा से रक्त की भिक्षा दी। शिव ने इस रक्त का मंथन किया तो इससे 'नर ' की उत्पत्ति हुई। जो भगवान नारायण के सखा हुए। शिव ने उस पुरुष को मारने की प्रार्थना भगवान नारायण से की। युद्ध करते हुए वह नर के हाथों से मारा गया। स्कन्दपुराण में वर्णन आता है कि, शिव के हाथ से ब्रह्मा का सिर बदरिकाश्रम में गिरा था। यहीं भगवान शिव ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए। जिस स्थान पर सिर गिरा उसका नाम ब्रह्ममोचन अथवा ब्रह्मकपाल तीर्थ हुआ।
"पिण्ड विधाय विधिवत् नरकात् तारयेत् पितृन्।
पितृतीर्थमिदं प्रोक्तं गयातोऽष्टगुणाधिकम्"
पितरों के निमित्त किया गया विधिवत् व श्रद्धापूर्वक पिण्डदान पितरों को अक्षय फल की प्राप्ति कराता है। ब्रह्मकपाल तीर्थ में पितरों के निमित्त पिण्डदान करने के पश्चात् पुनः कहीं ओर तीर्थ इत्यादि में पिण्डदान की आवश्यकता नहीं होती है। अर्थात् यंहा पिण्डदान के पश्चात् पितरों को दिव्यगति की प्राप्ति हो जाती है। यंहा दिया गया पिण्डदान अन्तिम और 'गया' से आठ गुना अधिक फलदायी होता है।

॥"ब्रह्मकुण्ड"॥

"ब्रह्मकुण्डमितिख्यातं त्रिषुलोकेषु विश्रुतम्॥"
 भगवान ने हयग्रीव अवतार लेकर मधु कैटभ दैत्यों का उद्धार किया था। उन दैत्यों से वेदों को मुक्त कर ब्रह्मा जी को दे दिया। वेद बदरिकाश्रम का प्रभाव देख वंहा  से ब्रह्माजी के साथ जाना नहीं चाहते थे। सिद्धों के समझाने पर वेद एकस्वरुप में द्रवरुप (जलरुप) में बदरिकाश्रम में रह गए तथा दूसरे ज्ञानरुप में ब्रह्माजी के साथ चले गए। यही वेद जलरुप में ब्रह्मकुण्ड में स्थित हो गए। वेदों को समझने व उनका ज्ञान पाने की अभिलाषा रखने वाला यदि यंहा तीन दिन उपवास करे तो वेद कृपापूर्वक उसके हृदयस्थ हो जाते हैं। ऐसी स्कन्दपुराण में कथा आती है। यह कुण्ड ब्रह्मकपाल के नीचे अलकनन्दा जी में है। कहीं कथा आती है कि ब्रह्मा की तपस्यस से सन्तुष्ट हो इसी कुण्ड से वेदोद्धार हेतु भगवान हयशीर्ष रुप में  प्रकट हुए थे।

॥''इन्द्रपदतीर्थ  (इन्द्रधारा)"॥

''तीर्थमिन्द्रपदं यत्रतपश्चाक्रे पुरन्दरः॥" (स्कन्दपुराण)
जंहा इन्द्र ने तप किया था। ऐसा इन्द्रपद नामक तीर्थ है। इस तीर्थ के बारे में कथा आती है कि वृत्रासुर के वध के पश्चात् इन्द्र को ब्रह्महत्या का महापातक लग गया था। इन्द्रासन छोड़कर इन्द्र इधर उधर भटक रहे थे। कहते हैं बदरिकाश्रम में आकर इन्द्र ने तप कर पुनः इन्द्र पद प्राप्त किया था। स्कन्द पुराण के बदरीनाथ महात्म्य प्रकरण में वर्णन आता है कि किसी भी महीने शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को इस तीर्थ में स्नान, वेदाध्ययन, विष्णुपूजन व दो दिन उपवास करने से अक्षयफल तथा इन्द्रलोक की प्राप्ति होती है। यह तीर्थ नारायण पर्वत पर बदरीनाथ से माणा जाने वाले मार्ग पर स्थित है।

॥"तप्तकुण्ड (अग्नितीर्थ)"॥

वह्नितीर्थं परिभ्राजद् भगवच्चरणान्तिके।
केदाराख्यं महालिङ्ग दृष्टानो जन्मभाग्भवेत्॥
(स्कन्दपुराण)
भगवान नारायण के चरणों में आदिकेदारेश्वर के समीप एवं भगवती अलकनन्दा के दक्षिण तट पर अग्नितीर्थ स्थित है। जिसमें स्नान इत्यादि से जन्मजन्मान्तरों के पाप नष्ट होकर भाग्योदय हो जाता है। इसकी कथा पुराणों में इस प्रकार है। भृगु ऋषि की गर्भवती पत्नी को एक राक्षस जिसके साथ पहले उनकी शादी की बात हुई थी अपहरण करके ले गया। अपहरण करते समय उसने अग्निहोत्र की अग्नि को पूछा था अग्निदेव इससे मेरी शादी की बात हुई थी या नहीं? अग्नि के हां कहने पर वो ऋषिपत्नी को बलपूर्वक ले गया। मार्ग में प्रसव (च्यवित) होने से उत्पन्न पुत्र का नाम च्यवन हुआ। उस तेजस्वी पुत्र के तेज से राक्षस नष्ट हो गया।
महर्षि ने अपनी पत्नी को न देख अग्नि से उसके सम्बन्ध में पूछा। अग्नि ने सारी बात बता दी। ऋषि ने क्रोधित होकर अग्नि को श्राप दे दिया जिस प्रकार तुमने बिना सोचे विचारे हां कर दी उसी प्रकार तुम सर्वभक्षी हो जाओ। महर्षि वेदव्यास के कहने पर अग्नि बदरिकाश्रम क्षेत्र में तप करने आ गए। भगवान नारायण ने उनकी घोर तपश्चर्या से प्रसन्न होकर अग्नि को दर्शन देकर वरदान मांगने को कहा। अग्नि ने अपने सर्वभक्षीपन के दोष को समाप्त करने का वरदान भगवान से मांगा। नारायण ने ऋषि से कहा तुम इस दिव्यक्षेत्र के प्रभाव से दोष व पाप मुक्त हो गये हो। अब तुम इस क्षेत्र में  रहने या आने वालों के पापों को मोचन या समाप्त करने का कार्य करो। तब से ही अग्निदेव एकरुप में यंहा रहकर श्रद्धालुओं के पापों को समाप्त कर रहे हैं। अग्नि के ही तेज से बदरिकाश्रम में गरम जल निकलता है। जोकि तप्तकुण्ड में स्नान हेतु एक नाली के द्वारा ले जाया जाता है। इसे ही अग्नितीर्थ कहते हैं। इस तीर्थ में स्नान, दान, जप, होम, सन्ध्या व देव पूजन आदि करने से करोड़ों गुना फल प्राप्त होता है। 
"चान्द्रायण सहस्रैस्तु कृच्छै कोटिभिरेव च।
यत्फलं लभतेबमर्त्यस्तत्स्नानात् वह्नितीर्थतः।"
(स्कन्दपुराण)  
हजारों चान्द्रयण व्रतों तथा करोड़ों कृच्छव्रत का फल अग्नितीर्थ में स्नान करने से प्राप्त हो जाता है। तीर्थ में रहने का फल तभी प्राप्त होता है जब तीर्थबुद्धि से रहा जाए। जब तक तीर्थबुद्धि अर्थात् तीर्थ पर श्रद्धा, विश्वास व समदृष्टि नहीं होगी तब तक तीर्थ का फल प्राप्त नहीं होता। स्कन्दपुराण में कहा गया कि
ज्ञानेन मोहवशतः पापं कुर्वन्ति येऽधमा:।
पैशाची योनिमायान्ति यावतिन्द्रश्चतुर्दश॥
अनाश्रमी चाश्रमी वा यावद् देहस्य धारणम।
न तीर्थे पावके कुर्यात् पातकं बुद्धिपूर्वकम्॥
अर्थात्  ज्ञान से (जानबूझकर) अथवा मोहवश अग्नितीर्थ में किया गया पाप एक कल्प अर्थात् चौदह इन्द्रों के बदलने तक पिशाच योनि को प्रदान करने वाला फल देता है। वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाला हो अथवा यति परमहंस हो जब तक देह का भान हो तबतक यत्न व बुद्धिपूर्वक अग्नितीर्थ में कभी पापकर्म व उसका विचार भी नहीं करना चाहिए।

॥ ''मातामूर्ति" ॥

''संगमाद्दक्षिणे भागे धर्मक्षेत्रं प्रकीर्तितम्।
यत्रमूर्त्यां सुतौजातौ नरनारायण वृषि॥"
(स्कन्दपुराण)
भगवती अलकनन्दा व सरस्वती के संगम के दक्षिण भाग में धर्मक्षेत्र है। जंहा धर्म की पत्नी मूर्ति के नर व नारायण दो पुत्र उत्पन्न हुए।
नारायण पर्वत पर संगम के दांए ओर भगवान नर - नारायण के पिता धर्म का क्षेत्र है। नारायण ने तपस्या में विघ्न न हो इसलिये अपनी पत्नी व माता-पिता को दूर रहने को कहा था। भगवती मूर्ति को रोता विलखता देख, अपनी माता को भगवान ने वचन दिया था कि वर्ष में एकबार दर्शन करने मैं आपके पास आऊंगा। उसी वचन को निभाने के लिये भगवान आज भी भाद्रपद मास की शुक्ल द्वादशी तिथि (वामन द्वादशी) को अपनी मां मूर्ति से मिलने बदरीनाथ से पधारते हैं।
अगले भाग में शेषनेत्र, चतुर्वेदधारा, मणिभद्रपुरी (माणा), गणेशगुफा, व्यासगुफा, भीमपुल, मानसरोवर धारा,मुचकुन्द गुफा का वर्णन होगा।
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