सेब में जड़ सड़न रोग-प्रबन्धन एवं उपचार

सेब में जड़ सड़न रोग के कारण ओर इसका उपचार कैसे करें,
खबर शेयर करें:

 सेब में जड़ सड़न रोग-प्रबन्धन एवं उपचार।



सेब में जड़ सड़न एक गम्भीर समस्या है,रोग होने के बाद इसके उपचार की तुलना में  रोकथाम का प्रबंधन करना ज्यादा आसान प्रभावी व असरकारक होता है।

 यह रोग  Pathogens रोगजनक (विषाणु, जीवाणु, कवक, परजीवी आदि) जिनमें मुख्यतः मृदा जनित फफूंद पायथियम  फाइटोफ्थोरा  राइजोक्टोनिया के कारण होता है। 

यह भी पढ़े - फूलगोभी में भूरापन और बोरान की कमी के लक्षण का कारण और उपचार कैसे करें की विस्तृत जानकारी।

जड़ गलन रोग का समय पर पता लगाना कठिन होता है, क्योंकि यह मिट्टी के अन्दर पौधे की जड़ों में होता है। यदि समय पर उपचार नहीं हुआ तो बाद में फ्लोएम कैम्बियम व जाइलम नम होकर सडने लगते हैं, संवहनी उत्तकों के क्षय के कारण पौधे के सभी भागों तक पोषक तत्वों की आपूर्ति नहीं हो पाती जिस कारण पौधे में सामान्य कमी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। रोग ग्रसित पौधे की पत्तियां पीली व उनकी शिरायें तथा किनारे लाल रंग के हो जाते हैं।

यह भी पढ़े - जनपद उत्तरकाशी के हरसिल क्षेत्र में फिर लौट सकता है सेब का स्केब रोग। सेब के फल पर भूरे धब्बे, पत्तियों का पीला पड़ना, सेब के फल का विकृत होने का कारण और उपचार कैसे करें की विस्तृत जानकारी।

    रोग के कारण पौधे में नई वृद्धि कम होती है और पौधे का विकास रुक जाता है, पत्तियों पीली पड़कर सूखकर गिरने लगती है। जड़ें सड़ कर गल जाती है जिस कारण पौधा मुर्झा कर सूखने लगता है। पुराने पौधे इस रोग से अधिक प्रभावित होते हैं। किन्तु योजनाओं में बिना कोरेन्टाइन के अन्य राज्यों से आपूर्ति किए गए रोगग्रस्त नये पौधों में भी यह रोग देखने को मिल रहा है।

 रोग फैलने के कारण -

रूट रोट मृदा जनित फफूंदों के कारण होता है,बगीचों में आवश्यकता से अधिक नमी छायादार स्थान पानी रुकता साथ ही अम्लीय मिट्टी (मृदा का कम पीएच मान ) एवं नेमेटोड से संक्रमित भूमि में रूट रोट रोग अधिक देखने को मिलता है।


पिछले वर्ष मिट्टी में गिरी संक्रमित पत्तियों, फलों एवं पौधे के अवशेषों  से यह रोग पनपता है। रोग के बीजाणु मिट्टी में जीवित पड़े रहते हैं तथा मिट्टी का तापमान बढ़ने एवं मिटटी में पानी की अधिकता में यह रोग फैलता है। पौधों के जमीन के पास वाले भाग में धूप का न लगना एवं तने के पास जल जमाव या पानी का नियमित रूप से भरा होना इस रोग के फैलने के प्रमुख कारण है। 

यह भी पढ़े - आखिर कैसे बनेगा उत्तराखंड आत्मनिर्भर -बीजू पौधे भी कश्मीर से खरीदे जा रहें हैं।

पौधों में पानी की अधिकता हो जाने से मिट्टी अधिक गीली  और संकुचित (Compressed) हो जाती है जिसके कारण मिट्टी में उपस्थित वायु रंध्र  बंद हो जाते हैं। पौधों की जड़ों को स्वस्थ रहने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है लेकिन मिट्टी में उपस्थिंत वायु रंध्र बंद होने से जड़ें, मिट्टी से ऑक्सीजन ग्रहण नहीं कर पाती हैं जिसके कारण जड़ें गलने और सड़ने लगती हैं।

    इस रोग में जड़ों के नष्ट  होने के कारण पौधे को पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं, जिसके कारण पौधे की ग्रोथ रुक जाती है और वह धीरे धीरे नष्ट होने लगता है। 


रोकथाम एवं प्रबंधन-


रोग होने के बाद इसके उपचार की तुलना में इसकी रोकथाम का प्रबंधन करना ज्यादा आसान असरकारक होता है।


जड़ सड़न रोग की रोकथाम के लिए बगीचों में पानी की निकासी का उचित प्रबंधन करना चाहिए। 


ग्राफ्ट यूनियन की जमीन से दूरी कम से कम 30 सेंटीमीटर या उससे अधिक होनी चाहिए।


पानी जमा होने से बचाने और संक्रमण की संभावना से बचने के लिए तने के चारों ओर 10 सेमी गहराई में एक फुट क्षेत्र तक मोटी रेत डाली जा सकती है।


फल तुड़ाई के बाद सेब के पौधों एवं जमीन पर गिरी पत्तियों व पौधों के अवशेषों पर फफूंद नाशक दवा कापर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव करें जिससे आगामी वर्षों में बाग में यह रोग न फैल सके।


पौधों की ट्रेनिंग व प्रूनिंग इस प्रकार करें कि पौधों के निचले जमीन से लगे हिस्से को भी पर्याप्त धूप मिल सके। धूप लगने पर फफूंद स्वत: ही नष्ट हो जाती है।


मृदा का पीएच मान 5.8 से 6.8 के बीच होना चाहिए,कम पीएच मान याने अम्लीय की दशा में भूमि में चूने का प्रयोग करें।


मृदा में आक्सीजन लेवल ठीक रहने से हानिकारक फफूद नहीं पनपपाते, मृदा का आक्सीजन लेवल तभी ठीक रहेगा जव भूमि की मिट्टी के कणों के बीच Air space होगा अतः भूमि को Compact न होने दें। मिट्टी के कणों के बीच Air space बना रहे इसके लिए अधिक से अधिक जीवांश वाली खादों का प्रयोग करेंं साथ ही पौधों की सूखी घासफूस से मल्चिंग करें। 


ट्राइकोडर्मा को भूमि में मिलायें ट्राईकोडर्मा न केवल मृदा जनित फफुंद बिमारियों के प्रबन्धन में सहायता करता है बल्कि इसके अलावा यह पौधे को पोषक तत्व उपलब्धता मैं सहायता करता है और साथ ही मृदा सुधार ( pesticides & Herbicide residual toxicity को कम करता है)  और फसल अवशेष का अपघटन Decomposition में भी योगदान देता है ।


नेमेटोड की रोकथाम हेतु अधिक से अधिक नीम केक या बकायन बीज के पावडर का भूमि में प्रयोग करें। थावलों में गेंद के फूल लगाने पर भी निमेटोड के संक्रमण से बचाव किया जा सकता है।


रोग के बीजाणु पानी के बहाव के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं  रोग अन्य पौधों पर न फैलै रोगग्रस्त पौधे से अन्य पौधों की ओर पानी का वहाव न होने दें साथ ही दूरी बनाए रखें। यदि रोग ग्रस्त पेड़ सूख गया हो तो उखाड़ कर नष्ट करें।


उपचार -

रूट रोट रोग का प्रारंभिक अवस्था में उपचार किया जा सकता है किन्तु रोग के अधिक फैलने पर इसका उपचार संभव नहीं है। रोग के लक्षण दिखाई देते ही एक ग्राम बेवैस्टीन दवा का एक लीटर पानी में घोल बनाकर एक एक फिट की दूरी पर भूमि में छेद कर थावलों में डालें। बोर्डों मिक्चर का प्रयोग करें।

   एहतियात के तोर पर मार्च के महीने में तने के चारों ओर 1.5 फीट के दायरे में मैन्कोजेब या कापर आक्सीक्लोराइड (0.3 प्रतिशत यानी 100 लीटर पानी में 300 ग्राम)  लीटर पानी में घोल से तर कर लें।   अगस्त से सितंबर तक यह प्रक्रिया दोहराएं।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें- 

डा० राजेंद्र कुकसाल।

मो० 9456590999

खबर पर प्रतिक्रिया दें 👇
खबर शेयर करें: