श्रीबदरीनाथ क्षेत्र के तीर्थ

श्रीबदरीनाथ क्षेत्र के तीर्थ,भगवान बदरीनाथ जी के विग्रह के साथ उनकी पञ्यायतन अथवा सभा में नर-नारायण, नारद, कुबेर, उद्धव, गणेश व गरुड़ जी विराजमान रहते
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 "श्रीबदरीनाथ तीर्थ दर्शन भाग 4"

(Sri Badari Nath Teerth Darashan Part 4)

"श्रीबदरीनाथ क्षेत्र के तीर्थ"
अनेकों प्रकट व गुप्त तीर्थों से युक्त होने के कारण ही बदरी क्षेत्र का विशालापुरी प्रख्यात हुआ। इस विषय में पूर्व में चर्चा कर ली गई है। भगवान नर और नारायण की इस तपोभमि में तीर्थ भाव से कोई आता है या रात्रिनिवास करता है तो वो देवतुल्य हो जाता है। इस क्षेत्र को भू वैकुण्ठ भी कहा जाता है। "विविधा कुण्ठा गते: प्रतिहतिस्तस्या: कर्त्ता इति वैकुण्ठ:"। जंहा कुण्ठाओं का अर्थात् निष्क्रियता, अकर्मण्यता, निराशा, हताशा, आलस्य और दरिद्रता का शमन हो जाए वही वैकुण्ठ है। यंहा के ऋषि नारद हैं। इसलिए इसको नारदीय क्षेत्र भी कहा जाता है। यंहा के समस्त तीर्थों के विषय में चर्चा मनुष्यमात्र की शक्ति से परे है। अतएव यथाशक्ति और यथाबुद्धि कुछ तीर्थों का स्मरण कर मन को पवित्र करने का प्रयत्न करेंगे।
भगवान बदरीनाथ जी के विग्रह के साथ उनकी पञ्यायतन अथवा सभा में नर-नारायण, नारद, कुबेर, उद्धव, गणेश व गरुड़ जी विराजमान रहते हैं।


"भगवान नर-नारायण"
भगवान के जितने भी अवतार होते हैं उनके साथ एक विशेष प्रयोजन होता है। तपस्या की महत्ता बताने के लिए सतयुग में भगवान का नर-नारायण अवतार हुआ।
सृष्टि के प्रारम्भिक काल में ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म हुए। दक्ष प्रजापति की पुत्री मूर्ति से इनका विवाह हुआ। श्रीमद्भागवतमहापुराण में वर्णन आता है।
"तूर्ये धर्मकलासर्गे नरनारायणवृषी।
भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद् दुश्चरं तपः॥" 
 (श्रीमद्भागवतमहापुराण स्कन्ध 1, अध्याय 3, श्लोक 9)
अर्थात् धर्म की पत्नी मूर्ति के गर्भ से भगवान ने नर-नारायण के रुप में चौथा अवतार ग्रहण किया।इस अवतार में उन्होंने ऋषि बनकर मन और इन्द्रियों का सर्वथा संयम कर बहुत कठिन तप किया।
श्रीमद्देवीभागवत में धर्म व मूर्ति के चार पुत्रों का वर्णन प्राप्त होता है।
हरिं कृष्णं नरं चैव तथा नारायणं नृप।
योगाभ्यास रतो नित्यं हरिः कृष्णो बभूवह॥
नर नारायणौ चैव चरेतुस्तप उत्तमम्। 
प्रालेयाद्रिं समागत्य तीर्थे बदरिकाश्रमे॥
(श्रीमद्देवीभागवत स्कन्ध 4, अध्याय 5, श्लोक 12,13)
देवीभागवत में हरि,  कृष्ण, नर व नारायण चार भाईयों का वर्णन है। हरि और कृष्ण तपस्या हेतु  पहले ही चले गए थे। कुछ समय पश्चात् माता की आज्ञा लेकर नर व नारायण भी पहले नैमिषारण्य व बाद में बदरिकाश्रम में तपस्या हेतु चले गए ऐसी कथा प्राप्त होती है।
नैमिषारण्य क्षेत्र में सहस्रकवच व प्रह्लाद इत्यादि से भगवान नर व नारायण का युद्ध होता है। सहस्रकवच के 999 कवच इन्होंने युद्ध में तोड़ दिए जो एक शेष रहा वो सूर्यदेव के पास चला गया था।
महर्षि च्यवन के कहने पर जब प्रह्लाद तीर्थयात्रा हेतु सर्वप्रथम नैमिषारण्य पंहुचे तो वंहा धनुष बाण के साथ नर नारायण को देखा। प्रह्लाद जी ने इनको ढ़ोंगी समझकर क्षेत्र छोड़ने हेतु कहा। नर ने क्रोधित होकर प्रह्लाद के साथ युद्ध प्रारम्भ कर दिया। दोनों भाई एक एक कर युद्ध करते परन्तु भगवान नृसिंह से अजेय व दूसरे के हाथ से मृत्यु न होने का वरदान प्राप्त प्रह्लाद को हरा न सके। प्रह्लाद ने भी ध्यान लगाकर भगवान को पहचान लिया। वंहा तपस्या में विघ्न होता देखकर दोनों अवन्ती क्षेत्र (उज्जयनी) में आए। 

नर के घोर तप से भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर दो वरदान दिए तुम छोटे हो पर तुमारा नाम पहले लिया जाएगा तथा  मैं तुमारा  सारथी बनूं ये तुमारी इच्छा भी पूर्ण करुंगा। नर अर्जुन, नारायण कृष्ण के रुप में अवतरित हुए। महाभारत युद्ध में भगवान ने अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया। सहस्रकवच का सूर्यदेव के पास शेष बचा कवच कर्ण को प्राप्त हुआ था।
    बदरिकाश्रम पंहुचकर दोनों ने घोर तप किया। इन्द्र ने घबराकर तपस्या में विघ्न डालने हेतु बसन्त एवं उसके सहयोगियों अप्सराओं को भेजा। भगवान नारायण ने इन्द्र का मान भंग करने के लिए अपनी जांघ को चीरकर दिव्य देवाङ्गनाओं की उत्पत्ति की, उनमें सबसे सुन्दर अप्सरा को इन्द्र के पास भेज दिया। 
     भगवान के उरु भाग से जन्म लेने के कारण उसका नाम उर्वशी हुआ। अप्सराओं ने भगवान से अपनी दासी बनाने की प्रार्थना की। भगवान ने कृष्णावतार में उनकी इच्छा पूर्ण करने का वरदान दिया। द्वापर में इन देवाङ्गनाओं (अप्सराओं) ने गोपियों के रुप में अवतरित होकर भगवान श्रीकृष्ण के साथ क्रीडाएं की। 


"महात्मा उद्धव"

भगवान श्रीकृष्ण के अभिन्न सखाओं में यदि गणना होती है तो एकमात्र नाम उद्धव जी का आता है। निर्गुण निराकार परमेश्वर के उपासक उद्धव को भगवान ने प्रेम का पाठ सीखने के लिये गोपियों के पास भेजा। गोपियों से मिलने के बाद उद्धव का सारा आत्मज्ञान व ब्रह्मज्ञान प्रेम के अश्रुवर्षण में बह गया था। उद्धव जी ने गोपियों को प्रणाम करते हुए कामना की -

"आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्वमृग्याम्॥"
(श्रीमद्भागवतमहापुराण स्कन्ध 10,अध्याय 47, श्लोक 61)

मेरे लिए सर्वोत्तम यही होगा कि मैं वृन्दावन में लता, झाड़ी अथवा औषधि बन जाऊं! ताकि इन पुण्यतमा गोपिकाओं की त्रिभुवन को पावन करने वाली चरणधूलि मेरे ऊपर पड़ती रहे। ये गोपियां धन्य हैं जिन्होंने स्वजन आत्मीयबन्धुओं व लोकाचार की मर्यादा का अत्यन्त कठिन त्यागकर श्रुति, उपनिषद् व भगवत्वाणी के लिए भी अप्राप्य भगवान की पदवी व प्रेम प्राप्त कर लिया है।

     जब भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीला का संवरण कर अपने दिव्यधाम को प्रस्थान की तैयारी कर रहे थे। तब भगवान ने उद्धव को भागवत धर्म का उपदेश दिया।
"कालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंज्ञिता।
मयाऽऽदौ ब्रह्मणे प्रोक्ता धर्मो यस्यां मदात्मक:॥"
(श्रीमद्भागवतमहापुराण स्कन्ध 11, अध्याय 14, श्लोक 3)
प्रिय उद्धव ! यह वेदवाणी समय के प्रभाव से प्रलय के समय लुप्त हो गयी। पुनः सृष्टि का समय आने पर सङ्कल्प से ही ब्रह्मा को मैंने उपदेश किया, इसमें मेरे भागवत धर्म का ही वर्णन है।
उद्धव को भगवान ने द्वारिकानगरी को शीघ्र छोड़कर बदरिकाश्रम में जाकर रहने को कहा। 
"गच्छोद्धवः मयाऽऽदिष्टो बदर्याख्यं ममाश्रमम्।
तत्र मत्पादतीर्थोदे स्नानोपस्पर्शनैः शुचिः॥"
(श्रीमद्भागवतमहापुराण स्कन्ध 11, अध्याय 29, श्लोक 41)
वर्तमान में उद्धव जी के विग्रह को भगवान के प्रतिनिधि रुप या उत्सव विग्रह के रुप में कपाट बन्द होने पर पाण्डुकेश्वर में लाया जाता है। शीतकाल के पश्चात् मनुष्यों के लिये कपाट खोले जाने पर उद्धव जी को पुनः गर्भगृह में स्थापित कर दिया जाता है। उत्सवों के अवसर पर भी उद्धव जी ही भगवान के प्रतिनिधि रुप में सम्मिलित होते हैं।
इस प्रकार कलियुग में साक्षात् उद्धव जी ही भगवान की आज्ञा से बदरिकाश्रम में निवास करते हैं।


"कुबेर"

कुबेर जी रावण के सौतेले बड़े भाई थे। भगवान शिव की आराधना करके इन्होंने धनाध्यक्ष होने का पद प्राप्त किया। रामायण में रावण द्वारा इनका पुष्पक विमान , राज्य और लंका पुरी की सारी सम्पत्ति छीनने का वर्णन प्राप्त होता है।इसके बाद इन्होंने तप के द्वारा शिव को प्रसन्न कर यक्षों का राज्य प्राप्त किया। अलकापुरी को अपनी राजधानी बनाकर ये धन के अधिष्ठाता बन प्रतिष्ठित हुए। 
ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु ने श्रीनिवासन के रुप में जन्म लेकर पद्मावती से विवाह के लिये कुबेर जी से इस प्रतिबन्ध के साथ धन लिया था कि वो कलियुग आने तक ब्याज सहित लौटा देंगें। आजतक भगवान ब्याज भी नहीं चुका पाए हैं। अपने धन को वापस पाने के लिए कुबेर जी कपाट खुलते ही पंचायतन में विराजमान हो जाते हैं।
देवताओं के धनाध्यक्ष कुबेर जी की मान्यता स्थानीय समाज में इष्टदेव की है। स्थानीय ग्रामीण परम्परा में बदरीनाथ के निकटवर्ती बामणी गांव व पाण्डुकेश्वर में कुबेर जी का मंदिर है। इष्ट देवता के रुप में इनकी पूजा की जाती है। माणा गांव में भी पडियार देवता जोकि कुबेर जी का ही स्वरुप है का पूजन किया जाता है।

"लक्ष्मीजी"

भगवान नारायण से लक्ष्मीजी की अभिन्नता है। नर नारायण अवतार के बाद भगवान ने लक्ष्मी जी से अलग रहने को कहा। समाधि इत्यादि में विघ्न न हो इसलिए भगवान एकाकी रहे। तप में सहायक बनते हुए भगवती लक्ष्मी ने नारायण पर्वत पर तपस्या की तथा भगवान के ऊपर से बैर (बदरी) की झाड़ी का रुप धारणकर शीत,बर्फ, धूप आदि से नारायण की रक्षा की। इसीकारण इसको बदरी क्षेत्र भी कहते हैं। 
अभी भी भगवती लक्ष्मी जी कपाट खुलने पर गर्भगृह से बाहर परिक्रमा  में अलग मंदिर में प्रतिष्ठित रहती हैं। कपाट बन्द करते समय रावल जी गोपी(सखी) का वेश धारण कर लक्ष्मी जी को गर्भगृह में भगवान के साथ स्थापित करते हैं।
नारद जी भगवान के मुख्य अर्चक(पुजारी) हैं। छः मास तक देवताओं की ओर से वे ही भगवान का पूजन अर्चन करते हैं।  गरुड़ जी भगवान के वाहन हैं। बदरीश क्षेत्र में इन्होंने तपस्या की थी। इस कारण इनका पंचायतन में स्थान है। इनका विस्तृत विवरण पंचशिला प्रकरण में आएगा।
अगले भाग में भगवान के द्वारपाल श्रीघण्टाकर्ण, भगवती अलकनन्दा व पंचशिलाओं की चर्चा करेंगे।
क्रमशः.....
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