कीर्तिखाल के पास प्रसिद्ध भैरवगढ़ी में भैरवमंदिर की विशेषता

भैरवगढ़ी में भैरवमंदिर, कीर्तिखाल के पास प्रसिद्ध भैरवगढ़ी में भैरवमंदिर की विशेषता
खबर शेयर करें:

  भैरवगढ़ी या लंगूरगढ़ी मंदिर।

उत्तराखंड देवभूमि के नाम से विश्व विख्यात है अनेकों देवताओं और ऋषि महर्षियों की तप स्थली रही है जिनके साक्ष्य धर्म ग्रंथो में अनेकों स्थान पर मिलते हैं।  पांडवों का यहां की संस्कृति में रचा बसा होना प्रत्येक क्षेत्र में पांडवलीला होना इसका प्रमाण है।  जनश्रुति के अनुसार महाभारत काल समाप्ति पर श्री हनुमानजी का पुनः संजीवनी लोक हिमालय की ओर आने का मन हुआ। कहते हैं, श्री हनुमानजी का एक पग लंगूरगढ़ी, दूसरा पग भैरवगढ़ी की तलहट, सिर भैरवगढ़ी के सर्वोच्च शिखर व पूँछ लंगूरी गांव में पड़ा। भैरवगढ़ी में कुछ दिन विश्राम के पश्चात श्री हनुमानजी अन्यत्र चले गए। तत्पश्चात श्री भैरवनाथ जी नेपाल से श्री हनुमानजी के पीछे-२ उत्तराखंड की  आए। सर्वप्रथम भैरवनाथ जी ने महाबगढ़ प्रवास किया, महाबगढ़ में उपयुक्त वातावरण न मिलने के कारण वे पहले लंगूरगढ़ी और बाद में भैरवगढ़ी में स्थाईतौर पर रहने लगे।


लोक जनमान्यताओं के अनुसार कलयुग प्रारम्भ होने पर एक घटना घटी। भैरवगढ़ी  बखरोड़ी गाँव की सरहद में पड़ता है। स्थानीय लोग बताते कि बखरोड़ी गाँव के लोगों की गाय-भैंसे इस  भैरवगढ़ी चारागाह में घास चुगने आते थे। रामा बकरोड़ी की एक भैंस बहुत दिनों से दूध नहीं दे रही थी।

    रामा बकरोड़ी को शक हुआ कि कोई भैंस का दूध निकाल लेता है। रामबकरोडी दूध कैसे निकल रहा को जानने के लिए छुपकर देखने लगा कि आखिर दूध जाता कहाँ है? उसने पाया कि भैंस एक चीड़ के पौधे के ऊपर खड़ी होकर सारा दूध वहीं छोड़ दे रही है। उसे गुस्सा आया और उसने वह चीड़ का पेड़ ही काट डाला। उसे यह देखकर हैरानी हुई कि पेड़ काटने से चीड़ के रस के बजाय खून निकला।

     उसी रात उसके सपने में श्री भैरवनाथ प्रकट हुए और उसे हकीकत बतलाई। साथ ही प्रायश्चित का मार्ग भी बतलाया कि उस स्थान पर एक मंदिर की स्थापना की जाय, जिसमें सेवा बकरोड़ी लोगों की होगी और पुजारी डोबरियाल लोग होगें। फिर मंदिर की स्थापना कर तभी से निरंतर श्री भैरवनाथ जी की पूजा भैरवगढ़ी में होती है। श्री रामा बखरोड़ी प्रथम सेवाकार व श्री चामा डोबरियाल प्रथम पुजारी के रूप में जाने जाते हैं। 

    क्षेत्रपाल के रूप में इस क्षेत्र में भगवान भैरवनाथ जी को अपर श्रद्धा व विश्वास के साथ माना जाता है। यह स्थान उत्तराखंड के जनपद पोडीगढ़वाल के पौड़ी कोटद्वार मार्र्ग पर गुमखाल से दायीं और का रास्ता सतपुली व बायीं और का रास्ता द्वारीखाल कीर्तिखाल होते हुए ऋषिकेश को जाता है। गुमखाल से लगभग 05 किलोमीटर आगे कीर्तिखाल स्थान है जिसके दायीं तरफ भैरवगढ़ी मंदिर जाने प्रवेश द्वार बना है यदि कोई कोटद्वार की तरफ से अपनी यात्रा शुरू करता है तो कोटद्वार से गुमखाल 34 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है व पौड़ी से गुमखाल 74 किलोमीटर पर स्थित है। प्रत्येक वर्ष जून माह में इस स्थान पर मेला आयोजित होता है जिसमें शामिल होने के लिए दूर दूर देश विदेश से लोग आतें हैं। 

भैरवगढ़ी मंदिर में कालभैरव के रूप में नियमित पूजा डोबरियाल जाति के लोग करतें हैं।  भगवान भैरवनाथ जी को काली वस्तुएं अतिप्रिय हैं इस बात का ध्यान रखते हुए मण्डुवा के  आटे से प्रसाद तैयार क्र भोग लगाया जाता है। अपनी मनोइच्छा को मांगने के बाद पूर्ण होने पर श्रद्धालु यहां पर चाँदी का छत्र या घण्टी को चढातें हैं।  आस्था और विश्वास का अटूट संगम देखना हो तो इस स्थान पर अवश्य पर अवश्य जाना चाहिए।  भैरवगढ़ी का असली नाम लगुंरगढ़ी है लंगूर पर्वत पर स्थित होने के कारण इस गढ़ का नाम लँगूरगढ़ी हुआ।  सन 1791 में इस गढ़ को जीतने के लिए गोरखाओं ने दो वर्ष तक इस स्थान की घेराबंदी करके रखी पर 28 दिनतक चले संघर्ष के बाद गोरखाओं को हार का सामना करना पड़ा और गोरखा लँगूरगढ़ से वापस गए।  गोरखाओं की इस सैन्य टुकड़ी में थापा नाम के एक सैनिक ने भगवान  भैरवनाथ की शक्ति को मानते हुए ताम्रपत्र भेंट किया था जिसका वजन लगभग 40 किलो है। 

 मंदिर के पास शक्ति कुंड व काली माँ का मंदिर भी है। यह मंदिर इस क्षेत्र के सबसे बीच और ऊंचाई पर बना है।  भैरवगढ़ी से चारों तरफ पर्वतश्रृंखलायें जिनमें बर्फ से ढकी पहाड़ियां और मनोरम दृश्य दिखाई देतें हैं।  पाठकों से अनुरोध है की एक बार इस मंदिर के दर्शन अवश्य करें। 




खबर पर प्रतिक्रिया दें 👇
खबर शेयर करें: