टमाटर फसल को हानि पहुंचाने वाले प्रमुख कीट एवं जैविक नियंत्रण- Major pest and biological control of tomato crop

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 टमाटर  फसल को हानि पहुंचाने वाले  प्रमुख कीट एवं जैविक नियंत्रण।

खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी का प्रयोग टिकाऊ विकास व पोषण सुरक्षा के लिए आवश्यक है। स्वास्थ्य कारणों को देखते हुए वर्तमान में समेकित नाशीजीव प्रबंधन द्वारा जैविक अधारित टिकाऊ खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। जो पर्यावरण व मानव के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। संन्तुलित भोजन में सब्जियों का महत्वपूर्ण स्थान है।

सब्जियों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोट्रीन, खनिजलवण और विटामिन पाये जाते हैं। हमारे शरीर के वृद्वि व विकास तथा अनेक विकारों से बचाने में विटामिन और खनिजों की आवश्यक्ता होती है। उक्त सभी आवश्यक पौषक तत्व प्राकृतिक रूप में सब्जियों से प्राप्त होते हैं। 

सब्जियों के उत्पादन में प्राकृतिक जोखिम के साथ-साथ कीट व व्याधियों के रूप में भी जोखिम होता है जिसका नियन्त्रण सही समय पर नहीं हो तो उत्पादन का स्तर शून्य तक होता जाता है। सब्जियों की फसल में कई प्रकार के रस चूसने व पत्तों एवं फलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का आक्रमण होता है। इन कीट व व्याधियों के प्रकोप होने से  सब्जियों की गुणवत्ता व उत्पादन का स्तर खराब हो जाता है। रोग व व्याधियों के जोखिम से कास्तकारों को लागत के बराबर भी मूल्य नही मिलता है जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान होता है। इस लेख में टमाटर की फसल पर लगने वाले कीट व रोगों की पहचान तथा उनका समेकित प्रबनधन किस तरह से किया जा सकता है के बारे  में विस्तार से बताया गया है जिससे टमाटर उत्पादक किसानों को लाभ मिल सके।

 1- सफेद मक्खी (बेमिसिया टेबेसाई) - कीट प्रकोपित टमाटर की पत्ती पीली क्लोरोटीक धब्बा युक्त हो जाती है। इस कीट के शिशु व वयस्क दोनों ही पत्तों की निचली सतह से रस चूसते हैं जिस कारण पत्तियां ऊपर की ओर मुडनी शुरू होजाती है व पीली पड़ने लगती हैं। इनके द्वारा बनाये गए मधु बिन्दु पर काली फंफूद आ जाती है। जिससे पौधे का प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है। यह कीट वायरस जनित कीट पर्ण संकुचक (लीफ कर्ल) रोग का वाहक होता है। वयस्क सफेद रंग की छोटी मक्खी होता है।

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जैविक विधि से नियन्त्रण-

1- सफेद मक्खी से प्रभावित फसल को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए।

2- कंघीध्एब्बुटिलोम इंडीकमद्ध खरपतवार को नष्ट करना चाहिए।

3- नत्रजन खाद का अनुशंसित मात्रा में ही प्रयोग करना चाहिए।

4- सिंचाई की उचित अन्तराल एवं मात्रा में करना चाहिए। 

5-उचित जल निकास का प्रबन्धन करना चाहिए।

6- पीला चिपचिपा ट्रेप ;यलो स्टीकी ट्रेप को कीट पकड़ने के लिए प्रयोग करना चाहिए।

रासायनिक विधि से सफेद मक्खी का नियंत्रण-  डायमिथोएट 30 ई0सी0 की 1.2 मिली0  या  मैलाथियान 50 ईसी 1.5 मि0ली0 प्रति 1 लीटर पानी एवं थायोमिथोक्जाम 25 डब्ल्यू0 जी0 4.0 मिली0 प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

2- टमाटर फल छेदक (होलीयोथिस)- 

यह कीट हरा से भूरा रंग का होता है। इस कीट की इल्ली में रंग परिवर्तन गुण होता है। मादा हल्का भूरा पीला रंग का एवं नर हल्का रंग का होता है। इस कीट का प्यूपा मिटटी व फल में बनता है। 

इल्ली के शरीर का आधा भाग फल के अंदर एवं आधा बाहर दिखाई पड़ता है। इस तरह फल क्षतिग्रस्त हो जाता हैं। एक सुंडी कई फलों को नुकसान पहुंचाती है। इसके अतिरिक्त ये पत्तों को भी हानि पहुंचाती हैं। इस कीट के प्रकोप होने से उत्पाद की गुण्वत्ता व मात्रा में बहुत कमी आती है।

यह भी पढ़ें - टमाटर की अधिक उपज लेने हेतु समय से करें कटाई छंटाई व टमाटर के पौधों को सहारा कैसे देना चाहिए।

जैविक विधि से रोकथाम -   

1-  प्रभावित फल से कीट की इल्ली को एकत्र करके [खेत से दूर नष्ट कर देना चाहिए। 

2- अमेरिकन गेंदा की 40 दिन की नर्सरी एवं टमाटर 25 दिन की नर्सरी की 1:16 के हिसाब से कतार में लगाना चाहिए।

3 -  फेरोमीन ट्रेप का प्रयोग करना चाहिए। 

4 -  जब फूल आना प्रांरभ हो जाये तो ट्राइकोग्रामा का प्रयोग सात दिन की अन्तराल में करना चाहिए। 

रासायनिक विधि से रोकथाम -  ऐजाडिरेक्टीन 1.0 ई.सी  को 2.0 मि.ली./ लीटर पानी  के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।

3- पत्ती  सुरंगक (लीफ  माइनर) (लिरियोमाइजा ट्राईफोली)-

इस कीट का वयस्क हल्का पीला रंग एवं मैगट बहुत छोटी पैर विहीन नारंगी-पीले रंग का होता है। इस कीट के शिशु पत्तों के हरे पदार्थ को खाकर इनमें टेढ़ी.मेढ़ी सफेद सुरंगे बना देते हैं, इससे पौधों का प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है। इस कीट के अधिक प्रकोप से पौधे की पत्तियां सूख जाती हैं। जिससे पौधा सूखने लगता है।

जैविक विधि से रोकथाम- 

1-  खेत की तैयारी करते समय पहली जुताई गहरी करके मृदा में उपस्थित प्युपा को बाहर निकाल दें एवं नष्ट कर दें। 

2- प्रकाश प्रंप्रच का प्रयोग नर मोथा को आकर्षित करने के लिए करना चाहिए।

3- खेत के किनारों पर व सिंचाई की नालियों में अरण्डी की फसल को ट्रेप फसल के रूप में लगाना चाहिए।

4- फसल पर उपस्थित अण्डो की समूह को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए। 

5- स्पोडोप्टेरा एन0पी0 वी0 250 एल0ई प्रति हेक्टेयर की दर से 2.5 किग्रा0 गुड़ के साथ मिलाकर छिड़काव करना चाहिए 

 रासायनिक विधि से नियंत्रण- क्लोपारीफास 20 ई0सी0 1.5 ली0 को प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

यह भी पढें- पत्तागोभी की जैविक खेती कैसे करें। पत्तगोभी की फसल पर लगने वाले कीट व रोग तथा उनकी रोकथाम कैसे करें।

4. मिली बग (फेररीसीया विरगाटा)

इस कीट का शिशु पीला-हल्की सफेद रंग का होता है। इस कीट की व्यस्क मादा पंखहीन ऐव सफेद वैक्स से ढकी रहती इस कीट से प्रभावित पौधे की रस चुसने से पत्तियां कुंचक व बौनी रह जाती हैं। पौधा के पत्ती शाखाओं पर सफेद रंग की मिली बग उपस्थित रहता है। फलों पर धब्बा जैसा कैंकर बन जाता है।  

जैविक विधि से उपचार- 

1- मिलीबग से  प्रभावित फसल को प्रारम्भिक अवस्था में उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए।

2- नीम के तैल का छिड़काव किसी लिथ्विड टिटरजैंट या शैम्पू के साथ मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

रासायनिक विधि से रोकथाम-  इमिडाक्लोरप्रिड 80.5 एस0सी0 0.6 मि0ली0 प्रति लीटर पानी अथवा थायोमेथाक्जाम 25 डब्ल्यू मिलीलीटर पानी या क्लोरपायरीफॉस 20 ई0सी0 2 मि0ली0 ली पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

5- रेड स्पाइडर माइट (टेट्रानाइकस स्पीसीज)

प्रभावित पत्तियों में सुनहरी जाल बन जाता है। इस कीट की मादा समुह में अण्डे देती है। पत्तियां सूख जाता है अधिक प्रकोप होने पर  फल एवं फूल कम लगते है। 

जैविक विधि से रोकथाम- 

1-नीम के तेल का छिड़काव किसी लिक्विड साबुन में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

2.एक लीटर  सात से आठ दिन पुरानी छांच/ मट्ठा को छः लीटर पानी में घोल बनाकर तीन चार दिनों के अन्तराल पर दो तीन छिड़काव करने पर भी कीटों पर नियंत्रण किया जा सकता है।

रासायनिक विधि से रोकथाम-

डायकोफाल 18.5 ई0सी0 2.5 मिलीलीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

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6- थ्रिप्स  (थ्रिप्स टेबासाई)

 इस कीट का शिशु पीला रंग का होता है। वयस्क कीट का गहरा रंग एवं कटाफटा पंख वाला होता है। कीट से प्रभावित पत्ती पर सिल्वर रंग की धारियां होती  है प्रभावित पौधे के फूल व फल लगने से पहले झड़ जाता है। यह कीट टमाटर में विल्टवायरस का वाहक होता है।

जैविक विधि से रोकथाम- 

1- रोगी पौधो को खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर देना चाहिए।

2-  यलो स्टेकी ट्रेप ;पीला चिपचिपा प्रपंच का प्रयोग करना चाहिए।

रासायनिक विधि से रोकथाम-

 डायमिथोएट 30 ई0सी  की 1 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयरवा की दर से छिड़काव करना चाहिए।

जैविक विधियों से कीटों का नियंत्रण की अधिक जानकारी-

1- फसल का  निरीक्षण समय.समय पर करके पौधों पर कीड़ों के अंडे, सूंडियों, प्यूपा तथा वयस्क यदि दिखाई दें तो पौधे के उस भाग को हटा कर एक पौलीथीन की थैली में इकट्ठा कर नष्ट करें।

2-  प्रकाश प्रपंच की सहायता से रात को कीड़ों को आकर्षित कर तथा उन्हें नष्ट करते रहना चाहिए। प्रकाश प्रपंच हेतु एक चौडे मुंह वाले वर्तन ; पारात, तसला आदि में कुछ पानी भरलें तथा पानी में मिट्टी तेल मिला लें उस वर्तन के ऊपर मध्य में विद्युत बल्व लटका दें यदि खेत में लाइट सम्भव न हो तो वर्तन में  दो ईंठ या पत्थर रख कर उसके ऊपर लालटेन या लैंम्प रख दें। अन्धेरा होने पर लालटेन या लैम्प को जला कर रखें।  वयस्क कीट प्रकाश से आकृषित होकर वल्व या लालटेन या लैम्प से टकराकर वर्तन में रखे पानी में गिर कर मर जाते हैं। सुबह परात से कीड़े निकालकर खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर देने चाहिए।

3- कीड़ों को आकर्षित करने के लिए फ्यूरामोन ट्रेप का प्रयोग करना व उन्हें नष्ट करना।

4- पीली एवं नीली स्टिकी ट्रैप का प्रयोग. स्टिकी ट्रेप पतली सी चिपचिपी शीट होती है।  स्टिकी ट्रैप शीट पर कीट आकर चिपक जाते हैं तथा बाद में मर जाते हैं। जिसके बाद वह फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं। स्टिकी ट्रैप कई तरह की रंगीन शीट होती हैं जो फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए खेत में लगाई जाती है। इससे फसलों पर आक्रमणकारी कीटों से रक्षा हो जाती है।  स्टिकी ट्रैप को घर पर भी बनाया जा सकता है। इसे टीन, प्लास्टिक और दफ्ती की शीट से बनाया जा सकता है। अमूमन यह चार रंग के बनाए जाते है, सफेद, पीला, नीला और काला। इसे बनाने के लिए डेढ़ फीट लम्बा और एक फीट चौड़ा कार्ड बोर्ड, हार्ड बोर्ड या टीन का टुकड़ा लें। उन पर  सफेद, काला, नीला व पीला चमकदार रंग लगा दें रंग सूखने पर उनपर ग्रीस, अरंडी तेल की पतली सतह लगा दें। 

इन ट्रैपों को पौधे से 30 .  50 सेमी ऊंचाई पर लगाएं। यह ऊंचाई कीटों के उड़ने के रास्ते में आएगी। टीनए हार्ड बोर्ड और प्लास्टिक की शीट साफ करके बार.बार इस्तेमाल किया जा सकता है। जबकि दफ्ती और गत्ते से बने ट्रैप एक दो बार इस्तेमाल के बाद खराब हो जाते हैं। ट्रैप को साफ करने के लिए उसे गर्म पानी से साफ करें और वापस फिर से ग्रीस लाग कर खेत में टांग सकते हैं। एक नाली हेतु दो ट्रेप प्रयोग करें।

5- एक चम्मच डिटर्जेन्ट साबुन प्रति दो लीटर पानी की दर से घोल बनाकर कर स्प्रे मशीन की तेज धार से कीटों से ग्रसित भाग पर छिड़काव करें। तीन दिनों के अन्तराल पर दो तीन बार छिड़काव करें। छिड़काव से पहले साबुन के घोल को किसी घास वाले पौधे पर छिड़काव करें यदि यह पौधा तीन चार घंटे बाद मुरझाने लगे तो घोल में कुछ पानी मिला कर घोल को हल्का कर लें।

6- एक लीटर सात आठ दिन पुरानी छांच/ मट्ठा को छः लीटर पानी में घोल बनाकर तीन चार दिनों के अन्तराल पर दो तीन छिड़काव करने पर भी कीटों पर नियंत्रण किया जा सकता है।

7- एक किलोग्राम लकडी की राख में दस मिली लीटर मिट्टी का तेल मिलाकर लकड़ी की राख प्रति नाली 500 ग्राम की दर से कीटों से ग्रसित खड़ी फसल में बुरकाव करना चाहिए। पौधों पर राख बुरकने हेतु राख को मारकीन या धोती के कपड़े में बांध कर पोटली बना लेंए एक हाथ से पोटली को कस्स कर पकड़े तथा दूसरे हाथ से डन्डे से पोटली को पीटें जिससे राख ग्रसित पौधों पर बराबर मात्रा में पढ़ती रहे। 

8- एक लीटर आठ दस दिन पुराना गौ मूत्र का छः लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। गौमूत्र जितना पुराना होगा उतना ही फायदेमंद होगा। 10 दिनों के अन्तराल पर फसल पर गौमूत्र का छिड़काव करते रहें।

9- व्यूवेरिया वेसियाना ; जैविक कीटनाशक फफूंद  5 ग्राम एक लीटर पानी में घोल बनाकर सायंकाल में पौधे की जड़ के पास की भूमि को तर करें।

10-  नीम पर आधारित कीटनाशकों जैसे निम्बीसिडीन निमारोन, बायो नीम या इको नीम में से किसी एक का 5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर सांयंकाल में या सूर्योदय से एक दो घंटे पहले पौधों पर छिड़काव करें। घोल में सैम्पू या डिटर्जेंट मिलाने पर दवा अधिक प्रभावी होती है।

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