What is green revolution- हरित क्रांति क्या है

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 What is green revolution- हरित क्रांति क्या है 

अरस्तू के शब्दों में " मिट्टी ही पौधे का पेट है" आजादी से पूर्व भारत की भूखी प्यासी भूमि जिसमें मुश्किल से 10% क्षेत्रफल में ही सिंचाई के साधन थे। धान ओर गेहूं की पैदावार प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देखे तो 8 किलोग्राम के लगभग उत्पादन था। घर मे उपलब्ध गोबर की खाद का इस्तेमाल खेतों में किया जाता था। उर्वरकों का प्रयोग ज्यादातर जिन फसलों का रोपण होता था उन तक ही सीमित था।

भारत में हरित क्रांति क्यों, कब और कैसे,  हरित क्रांति के जनक, हरित क्रांति के उद्देश्य, हरित क्रांति का आर्थिक स्थिति पर प्रभाव  तथा इसके परिणाम क्या थे की जानकारी इस लेख में दी गयी है 

"हरित क्रांति" पृष्ठभूमि-  

आजादी से पूर्व  सन 1947 तक देश मे कृषि और किसान दोनों की स्थिति दयनीय थी। कृषि और किसान की दशा सुधारने के लिए आजादी से पूर्व  कोई भी कार्य नही किये गए। अपितु जमीदारों, मालगुजारों ओर साहूकारों द्वारा किसानों का शोषण किया गया। जिसके लिए किसानों द्वारा अनेक राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाये ओर अपने पर हुए अनावश्यक अत्याचारों के विरोध में ही किसान समय के साथ साथ कमजोर होता गया। जिससे आजादी के बाद भारत मे सबसे बड़ी समस्या भोजन की हुई क्योंकि पारंपरिक रूप से खेती की जा रही थी, जिसका औसत उत्पादन बहुत कम था। जनसंख्या का आकार बड़ा और उत्पादन का स्तर कम होने के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था- "बाकी सब चीजों का इन्जार किया जा सकता है लेकिन कृषि के लिए नही"।

  खेती में सिंचाई के साधन ओर उर्वरकों की मात्रा बढाने के लिए 8 दिसम्बर 1951 को भारत की संसद में पहली पांच साल की योजना को  भारत के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा प्रथम पंचवर्षीय योजना में मुख्य रूप से बांधो ओर सिंचाई में निवेश सहित कृषि प्रधान क्षेत्र के लिए सिंचाई ओर ऊर्जा के लिए 27.2 प्रतिशत व कृषि और सामुदायिक विकास के लिए 17.4 प्रतिशत बजट आवंटित किया था। इसके साथ तीसरी पंचवर्षीय योजना में कृषि और गेहूं के उत्पादन में सुधार के लिए जोर दिया गया पर 1962 में भारत चीन के युद्ध होने के कारण रक्षा के क्षेत्र पर सरकारों का ध्यान ज्यादा गया। दोनों पंचवर्षीय योजनाओं में बजट आवंटन  भारत को कृषि के क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम था।

1950 से 1960 के दशक में "शिप टू माउथ" की स्थिति हावी थी इसका कारण खेती में उन्नतशील बीज और अन्य तकनीकियों को सम्मिलित नही किये जाने से उत्पादन का स्तर अति न्यून था और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आजादी के बाद भी बहुत से दोष थे।

सन 1943-44 में बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश, भारत का पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा) का अकाल पड़ा था। यह समय द्वितीय विश्व युद्ध का था। जिसमें 30 लाख लोगों की भूख से तड़फकर मौत हो गयी थी। माना जाता है कि बंगाल के अकाल का कारण अनाज का उत्पादन कम होना था। जबकि उस समय बंगाल से अनाज का निर्यात हो रहा था।

मार्च 1963 में नॉर्मन बोरलॉग के द्वारा भारत का भ्रमण कृषि की दशा को देखने के लिए हुए था। इस समय मेक्सिको मूल के अर्ध बौने गेहूं की प्रति हेक्टेयर उपज 4 से 5 टन थी जबकि भारत के पारंपरिक बीज की औसत उपज 2 टन थी जो कि लंबी पुवाल वाला था और अधिक खाद देने पर पौधा जमीन में ढल जाता था।

हरित क्रांति का अर्थ-  खाद्यान्न की अधिक उत्पादकता से उत्पादन के लिए अनुकूल परिस्थिति बनाना है। नई तकनीकी, सेवाओं, सरकार की नीति और किसानों का आपसी सामंजस्य हरित क्रांति के सफल सम्पादन हेतु आवश्यक है। हरित क्रांति जो कि एक सरकारी कार्यक्रम था को जनक्रांति में पंजाब के किसानों ने बदला था।

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हरित क्रांति क्या और कैसे -

वर्ष 1960 के मध्य में स्थिति और भी दयनीय हो गई जब पूरे देश में अकाल की स्थिति उत्पन्न होने लग गयी थी। उन परिस्थितियों में भारत सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने 'समय की मांग" कहते हुए मेक्सिको से गेहूं के बीज के आयात के लिए मंजूरी दी थी।अपनी उच्च उत्पादकता के कारण इन बीजों को उच्च उत्पादकता किस्में (High Yielding Varieties- HYV) कहा जाता था। इन प्रयासों से गेहूं का रकबा 4 हेक्टेयर से बढ़कर 1970 में 40 लाख हेक्टेयर भूमि पर गेहूं की बुवाई की गई और 1964 में सर्वाधिक 120 लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ। किसानों द्वारा अधिक उत्साह दिखाने पर 1968 भारत में रिकॉर्ड 170 लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ।

1964 में सी0 सुब्रमण्यम देश के खाद्य एवम कृषि मंत्री थे तो उनके द्वारा कृषि क्षेत्र के विकास के लिए  खाद- उर्वरक व सिंचाई साधनों के लिए अपने स्तर से शीर्ष प्राथमिकता के आधार पर इनके विकास के लिए काम किया। वर्ष 1960-63 के दौरान भारत के 7 राज्यों के 7 चयनित जिलों में हाइब्रिड बीजों के प्रयोग को  कृषि जिला कार्यक्रम (Intensive Agriculture district programme- IADP) नाम से संचालित योजना के अंतर्गत किया गया।  यह प्रयोग सफल रहा तथा वर्ष 1966-67 में भारत में हरित क्रांति को औपचारिक तौर पर अपनाया गया।

भारत में अनाज उगाने के लिये प्रयुक्त पारंपरिक बीजों के स्थान पर उन्नत किस्म के बीजों के प्रयोग को बढ़ावा देकर देश में अनाज कमी को दूर करके अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए हरित क्रांति को देश में कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिये लागू किया गया था।

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उच्च उत्पादकता वाली किस्मों (HYVs) को पारंपरिक बीजों के स्थान पर प्रयोग करने पर  अधिक सिंचाई , उर्वरक, तथा रोग व कीटनाशक की आवश्यकता हुई । भारत सरकार ने पहली और तीसरी पंचवर्षीय योजना में इनकी आपूर्ति हेतु सिंचाई योजनाओं का विस्तार किया तथा उर्वरकों आदि पर सब्सिडी देना प्रारंभ किया।

प्रारम्भ मे गेंहू ओर धान के उत्पादन में अपेक्षा के अनुरूप वृद्धि होने पर किसानों की जागरूकता में अप्रत्याशित वृद्धि होने के कारण भारत सरकार द्वारा धान, गेहूं, ज्वार ओर बाजार की उच्च उपज वाली किस्मों के विकास के लिए 1967 में कार्यक्रम शुरू किए। परिणामस्वरूप भारत में अनाज उत्पादन में अत्यंत वृद्धि हुई।

खाद्यान्न उत्पादन में क्रांतिकारी प्रगति होने के कारण अक्टूबर 1968 में अमेरिका के विलियम गुवाड़ ने इस प्रगति का नाम "हरित क्रांति" का नाम दिया।

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हरित क्रांति के जनक व भारत में हरित क्रांति के जनक- 

नॉरमन बोरलॉग हरित क्रांति के प्रवर्तक माने जाते हैं। लेकिन भारत में हरित क्रांति लाने का श्रेय सी सुब्रमण्यम को जाता है एम0 एस0 स्वामीनाथन एक जाने माने वनस्पति विज्ञानी थे जिन्होंने हरित क्रान्ति लाने के लिए सी सुब्रमण्यम के साथ काम किया

भारत में हरित क्रांति के आर्थिक प्रभाव- 

1 - हरित क्रांति से खाद्यान्न उत्पादन में देश आत्मनिर्भर बना। 

2 - वर्ष 1970 में रिकॉर्ड 40 लाख हेक्टेयर भूमि पर गेहूं की बुवाई की गई।

3 - वर्ष 1968 में गेहूँ का उत्पादन 170 लाख टन रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था तथा  बाद के वर्षों में  उत्पादन का स्तर लगातार बढ़ता गया।

4 - हरित क्रांति के बाद कृषि में नवीन मशीनों जैसे- ट्रैक्टर, सीडड्रिल मशीन , हार्वेस्टर, ट्यूबवेल, पंप आदि का प्रयोग किया जाने लगा है। 

5 - तकनीकी के प्रयोग से कृषि का स्तर बढ़ा तथा कम समय और श्रम में अधिक उत्पादन संभव हुआ।

6 - परिवहन की सुविधा हेतु सड़कों का निर्माण, सिंचाई साधनो का विकास, किसानों के लिए बीज भंडारण व उपज खरीद केंद्रों और अनाज मंडियों का विकास हुआ।

7 - हाइब्रिड बीजों, कीटनाशकों, खरपतवारनाशी तथा रासायनिक उर्वरकों की मांग में तीव्र वृद्धि हुई।  देश में इनसे संबंधित उद्योगों का विकास हुआ।

8 - हरित क्रांति के फलस्वरूप कृषि व कृषकों के विकास के लिए - फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price- MSP) के साथ साथ किसानों को सब्सिडी सेवाओं का प्रावधान भी इसी समय शुरू किया गया।

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9 - वाणिज्यिक, सहकारी बैंक तथा कोआपरेटिव सोसाइटी आदि के माध्यम किसानो को वित्तीय सहायता तथा ऋण सुविधाएँ दी जाने लगी। 

हरित क्रांति के बाद कृषि पूर्व की अपेक्षा अपने पेट भरने के लिए अनाज उत्पादन का साधन नहीं अपितु किसानों की  आय का मुख्य स्रोत बन गई है। हरित क्रांति से भारत के ग्रामीण समाज में सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक रूप से व्यापक स्तर पर बदलाव हुए। ग्रामीण समाज जो अपनी फसल को कभी बेचता नहीं था वो  बाज़ारोन्मुख हुए। किसानों की आय बढ़ने से उनके सामाजिक एवं शैक्षिक स्तर का विकास हुआ।

हरित क्रांति का प्रभाव बड़े किसानों के लिये अधिक लाभप्रद रहा, छोटे और सीमांत किसानों के पास  नई तकनीकी में लगने वाली अत्यधिक लागत को वहन करने की क्षमता नहीं थी। जिसके कारण बड़े कास्तकार या किसान पूंजी का निवेश नई तकनीकी में करने लगे और समृद्ध होते गए।

वर्तमान में किसानों की स्थिति -

वर्तमान में  खेती किसानी को लाभ का काम नही समझा जाता है। इसका कारण खेती का कार्य फायदेमंद नही रह गया है। बाजार की रणनीति से किसान अधिकतर वाफिक नही रहता है और किसान के द्वारा अधिकतर उत्पादित उत्पाद को बाजार में उचित दाम न मिलने के कारण लागत के बराबर भी मूल्य नही मिलने से किसान को हर समय घाटा हो रहा है। सरकार के द्वारा अपेक्षाकृत खेती के लिए अधिक ध्यान न देना भी किसान के लिए मूलभूत सामाग्री जुटाना मुश्किल हो रहा है। स्पष्ट नीतियों का न होना और बिचौलियों द्वारा अधिकतर किसान के उत्पाद की कीमत तय करना भी इसका प्रमुख कारण है। किसान की आने वाली पीढ़ी खेती किसानी से विमुख हो रही है यदि कोई अवसर आजीविका सृजन का मिलता है तो आधे से ज्यादा किसान खेती छोड़ने को तैयार हैं। खेती को आर्थिक रूप से लाभकारी बनाने के लिए अग्रणी तकनीकी से जोड़ने की आवश्यकता है।

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