Orgenic Tomato Farming- टमाटर की जैविक खेती

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टमाटर की जैविक खेती 

टमाटर उष्णकटिबंधीय जलवायु की फसल है। इसकी खेती समुद्रतल से 10000 फुट की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक की जा सकती है। टमाटर के बीज के अंकुरण के लिए 20 से 44 डिग्री  सेल्सियस तापमान अभीष्ट है। देश के मैदानी भागों में टमाटर की खेती मुख्य रूप से रबी के मौसम में ओर पहाड़ी क्षेत्रों में ग्रीष्म तथा वर्षा ऋतु में की जाती है। टमाटर में लाइकोपीन की मात्रा 20 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच सर्वाधिक होता है तापमान बढ़ने पर लाइकोपीन का निर्माण कम होता है। टमाटर का प्रयोग अन्य सब्जियों के साथ मुख्यतः मिश्रित सब्जी के रूप में किया जाता है। इसमें लाइकोपीन पदार्थ कैंसर अवरोधी गुण के साथ-साथ विटामिन 'ए' की पूर्ति करता है।

भूमि का चुनाव-  टमाटर की फसल के लिए जैविक पदार्थ की पर्याप्त मात्रा व उचित जल निकास वाली बलुई द दोमट मिट्टी  सर्वोत्तम रहती है। मृदा में अधिक अम्लीयता टमाटर की फसल उत्पादन के लिए उपयुक्त नही होती है। अगेती फसल के लिए हल्की भूमि  व अधिक उपज ओर जहां सिंचाई का साधन हो चिकनी दोमट या दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है। मृदा में अम्लीयता अधिक होने पर मृदा में 8 से 10 कुंतल प्रति हेक्टेयर की दर से चूने का प्रयोग किया जाता है। मृदा में चूने का प्रयोग 3 साल में करना चाहिए।

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उन्नतशील किस्म- 

1- स्वर्ण सम्पदा-  रोपाई के 55-60 दिन बाद प्रथम तुड़ाई योग्य हो जाती है। औसत उपज 100 से 105 टन/ हेक्टेयर। उत्तरांचल, उत्तरप्रदेश, झारखंड व  पंजाब के लिए यह अनुशंसित किस्म है। अंगमारी रोग प्रतिरोधी किस्म है। पौधशाला में बीज बुवाई का समय अगस्त सितंबर व फरवरी से अप्रैल माह है।

2-  एच0 एस0 101- इस प्रजाति के फलों की प्रथम तुड़ाई पौध रोपण के 80-85  दिन बाद हो जाती है। औसत उपज  250 से 300 टन प्रति हेक्टेयर ।

3-  एच0 एस0 102- रोपाई के 80 से 85 दिन बाद फल तुड़ाई योग्य हो जाते हैं। फल का छिलका मोटा ओर लाल होता है।औसत उपज - 250- 270 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है।

4 - चेरी टमाटर (स्वर्ण रतन)-  यह सलाद के प्रयोग में लाया जाता है। इसके फल गुच्छे में लगते हैं जो कि 10 से 12 गुच्छे तक होते हैं। एक फलवजन 10 से 15 ग्राम होता है। औसत उपज 50- 60 टन प्रति हेक्टेयर है।

5- पन्त- टी1- यह किस्म गर्मियों ओर सर्दियों दोनों मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त है। सर्दियों के मौसम में 380 कुन्तल तक उपज मिलती है।

अन्य किस्में- पूसा गौरव, पंजाब केसरी, स्वीट-72, एच एस 102, पूसा रूबी, सलेक्शन 120, पूसा अर्ली डुआर्फ़, सलेक्शन 120, सलेक्शन 152, पन्त- टी2, अर्का विकास, पी0एन0आर0 7, पूसा गौरव, पूसा शीतल, पन्त बिहार, एन0डी0टी0-5, नरेंद्र टमाटर।

संकर किस्में- दिव्या संकर, शीतल टमाटर, रश्मि टमाटर सेंचुरी 1, रश्मि टमाटर सेंचुरी 2, टमाटर स्वर्ण, पूसा न0 1, टमाटर सुप्रिया, नवीन, पूसा न0 2, पूसा न0 4 एच0आई0 303।

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बीज बुवाई का समय-

मैदानी क्षेत्रों में- शरदकालीन- अगस्त सितंबर, ग्रीष्मकाल- जनवरी- फरवरी  वर्षाकाल- अप्रैल- मई।

पहाड़ी क्षेत्रों में- मार्च अप्रैल।

पौध तैयार करना- नर्सरी में रोग व कीट की रोकथाम के लिए नर्सरी को जिस भूमि पर तैयार करना हो उसको सूर्य के प्रकाश से उपचारित करते हैं। 10-15 अप्रैल को 3×1 मीटर आकार की 20-30 सेमी ऊंची क्यारियों को तैयार करके 20 से 25 किलोग्राम कम्पोस्ट खाद या सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ 1 किलोग्राम करंज की खली को क्यारियों में अच्छे से मिलाते हैं। फिर क्यारियों में सिंचाई करके पारदर्शी प्लास्टिक से ढक देते हैं।

बीज दर- सामान्य किस्में- 200 से 250 ग्राम/ हेक्टेयर।

संकर बीज- 150- 250 ग्राम/हेक्टेयर।

बीज उपचार-  बीज को ट्राइकोडर्मा से 4 ग्राम/किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।

पौध रोपण- शरदकालीन फसल के लिए पौध से पौध की दूरी 60 सेमी व पंक्ति से पंक्ति की दूरी 75 सेमी0 व ग्रीष्मकाल में पौध से पौध की दूरी 45 व पंक्ति से पंक्ति की दूरी 75 सेमी रखनी चाहिए।

खाद- टमाटर की फसल में जैविक खाद का अधिक महत्व है। 250 से 300 कुन्तल गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट की खाद को 2 कुन्तल अरण्डी/ नीम/ करंज की खली को खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। अम्लीय मिट्टी में 4 कुन्तल/ हेक्टेयर की दर से कृषि योग्य चूना मिला देना चाहिए। जब फसल 25-30 दिन की हो जाये तो दो बेग सुपर गोल्ड मैग्नीशियम ओर माइक्रो झाझम 500 मिली को 500 लीटर पानी मे घोलकर पौधों को तर कर देना चाहिए। यह छिड़काव 15 से 20 दिन के अंतर पर करते रहना चाहिए।

पलवार करना- पौधों की पहली निराई के बाद सूखे पत्तों से पलवार कर देनी चाहिए। पत्तियों से पलवार 5 सेमी मोटी होनी चाहिए।

पौधे को सहारा देना- फल के स्वस्थ व चमकदार बनने के लिए पौधे को लकड़ी के सहारे या धागे का जाल बनाकर सहारा देना चाहिए। 

जड़ों पर मिट्टी चढ़ाना- टमाटर की जड़ें उथली होती हैं इसके लिए प्रत्येक निराई गुड़ाई के बाद जड़ों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।

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कीट एवं रोग नियंत्रण -

1 - फल बेधक- इस कीट के पिल्लू फलों पर छेद करके नुकसान पहुंचाते हैं।  पत्तियों पर कीट के अंडे दिखने पर ट्राइकोकार्ड एवं प्रकाशपाश का प्रयोग करना चाहिए। समेकित प्रबंधन उपाय में गेदें के पौधों को मुख्य फसल के चारों तरफ लगा देना चाहिए जिससे कीट गेंदे के फूलों पर आकर्षित होकर मुख्य फसल में नुकसान न पहुंचा पाएं। इस कीट का प्रकोप मार्च अप्रेल में अधिक होता है।

2 - कटुवा कीट - यह कीट  मटमैले रंग की गिडार होता है जो रात को निकलकर पौधे को जमीन की सतह से काटकर अलग कर देता है इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा गोमूत्र के साथ मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

3 - सफ़ेद मक्खी - यह कीट लीफ कर्ल वायरस का वाहक होता है इसकी रोकथाम के लिए बीज उपचार ट्राइकोडर्मा से करना चाहिए। कीट के प्रकोप होने पर इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा गोमूत्र के साथ मिलाकर 250 मिलीलीटर प्रति 30 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

4- सूत्रकृमि- यह कृमि पौधों की जड़ों में गांठ बनाकर जड़ों को प्रभावित करते हैं। जिसके कारण पौधों के शरीर मे पोषक तत्वों का संचार नही हो पाता है। पौध कमजोर होकर पीले पड़ जाते हैं व ऐसे पौधों पर फल नही लग पातें हैं। इस रोग का कारक Phthium Spp. या Rhizoctinia spp. है। इसकी रोकथाम के लिए मृदा उपचार 2.5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा को 25 किलो गोबर की खाद में मिलाकर बोरी से 20 से 25 दिनतक ढककर रखते हैं तथा बोरी को गीला करके रखते हैं ततपश्चात इस खाद को गोबर के साथ अच्छे से मिलाकर खेत की तैयारी के समय डालते हैं। नीम का काढ़ा को गोमूत्र के साथ मिलाकर 250 मिलीलीटर प्रति 30 लीटर पानी मे मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

5- अगेती झुलसा - यह फफूंदीजनित रोग है। इस रोग के कारण पत्तियों पर काले गोल सकेन्द्रीय छलेनुमा गोले बनते हैं। यह रोग आल्टरनेरिया सोलेनाइ, आल्टर नेरिया अल्टरनेटा कवकों के कारण होता है। अधिक नमी होने से यह रोग होता है। यह रोग बीज जनित रोग है। इसकी रोकथाम के लिए बीज उपचार ट्राइकोडर्मा से करना चाहिए। इस रोग के अधिक प्रभाव होने से नीम का काढ़ा ओर गोमूत्र मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

6- पछेती झुलसा- इस रोग के कारण पत्तियां, तने ओर फलों पर धब्बे बनते हैं इस रोग की रोकथाम के लिए उचित जल निकास ओर पौध को लकड़ी की डंडी या धागे की मदद से सहारा देकर चढ़ाना चाहिए। इस रोग का कारक phytopthora infectans फफूंदी है।

7- जीवाणु मुरझा रोग- इस जीवाणुजनित रोग के प्रभाव से पौधे सूखकर मर जाते हैं। यह रोग सोलेनेसी परिवार की सब्जियों में अपना अधिक प्रकोप दिखता है। इस रोग की रोकथाम के लिए उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए तथा टमाटर, आलू, मिर्च और बैगन को एक ही खेत मे नही लगाना चाहिए। खेत मे जल निकासी का उचित प्रबंधन करना चाहिए।

औसत उपज- प्रति हेक्टेयर 150 से 250 कुन्तल।

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