Organic farming of brinjals-बैगन की जैविक खेती

बैगन की जैविक खेती, बैगन की उन्नतशील किस्में, बैगन की नर्सरी ओर रोपण का समय, बैगन के कीट एवं रोग नियंत्रण जैविक विधि से, बैगन की औसत उपज,
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  बैगन की  जैविक खेती 

आलू और टमाटर के बाद बैगन का उत्पादन भारत मे तीसरे स्थान पर होता है। पौष्टिकता की दृष्टि से बैगन को टमाटर के समकक्ष समझा जाता है। इसके बीज क्षुधावर्द्धक होते हैं तथा पत्तियां में विटामिन C पाया जाता है व पत्तियां मन्दाग्नि व कब्ज में फायदा पहुंचाती हैं। बैगन उत्पादन में  भारत का स्थान विश्व में चीन के बाद दूसरा सबसे अधिक पैदावार वाला देश है । बाजार अधिक खपत होने व कम लागत में अधिक उपज किसान की आमदनी के लिये बैगन का उत्पादन एक अच्छा साधन है। जैविक विधि से उत्पादन करने पर उत्पाद का मूल्य अधिक मिलता है। अधिक उत्पादन लेने के लिए उन्नतशील किस्मों एवं वैज्ञानिक तरीकों से खेती करना आवश्यक है। बैंगन की खेती को अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों को छोड़कर भारत में लगभग सभी क्षेत्रों में की जाती है।


  भूमि का चयन- 

        बैगन की खेती के लिए उचित जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी उत्तम होती है। भारी मिट्टी जिसमें कार्बनिक पदार्थ अधिक हो में भी खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है। मृदा का पीएच मान 5.5 से 6.0 होना चाहिए।

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खेत की तैयारी- 

    खेत मे पहली जुताई गहरी करने के बाद 3 जुताई करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा चला देना चाहिए। अंतिम जुताई के समय ट्राइकोडर्मा युक्त खाद को मिट्टी में फैलाकर बुवाई से 15 से 20 दिन पूर्व खेत मे मिलाकर हल चलाकर पाटा लगा देना चाहिए। जिन स्थानों में खेत मे नमी की मात्रा कम हो उनमें पलवार लगानी चाहिए।

खाद-

गोबर या कम्पोस्ट खाद 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की अंतिम जुताई के समय खेत में मिला देना चाहिए । नीम या करंज की खली को 2 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से कम्पोस्ट खाद या गोबर की खाद में मिलाकर करना चाहिए।

भूमि उपचार-

एक किलोग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर को 25 किलोग्राम कमोस्ट की खाद या सड़ी गोबर की खाद में मिलकर 7 दिन तक छायादार स्थान पर रखकर गीले बोर से ढका देना चाहिए जिससे ट्राइकोडर्मा के बीजाणु अंकुरित हो जाएँ यह खाद एक एकड़ या 20 नाली खेत में फैला दें व अंतिम पाटा चला दें। ट्राइकोडर्मा पौधों में जिबरेलिन एसिड, सायटोकाइनिन व इंडोल एसिटिक एसिड को भी उत्पन्न करता है। मिट्टी से होने वाली विभिन्न फंफूद वाली बीमारियों से बचाव करता है।

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उन्नतशील किस्में -

स्वर्ण श्यामली

फलों के ऊपर सफेद रंग के धारियां होती है। इसकी पत्तियां एवं फलवृंतों पर कांटे होते हैं। भू-जनित जीवाणु मुरझा रोग प्रतिरोधी इस अगेती किस्म के फल बड़े आकार के गोल, हरे रंग के होते हैं। इसकी औसत उपज 600-650 कुंतल/हेक्टेयर  है।

यह प्रजाति  भू-जनित जीवाणु मुरझा रोग के लिए सहिष्णु है। इसके फल अंडाकार मखनिया-सफेद  रंग के होते हैं। यह भुरता बनाने के लिए उपयुक्त किस्म है।  इस किस्म कीऔसत उपज 550-600 कुंतल/हेक्टेयर  है।

स्वर्ण प्रतिभा

 मुरझा रोग के लिए यह के प्रतिरोधी किस्म है। इसके फल बड़े आकार के लंबे चमकदार बैंगनी रंग के होते है। इसकी औसत उपज 600-650 कुंतल/हेक्टेयर  है।

स्वर्ण शक्ति

 बैंगनी रंग लंबे चमकदार फल  होते हैं। फल का औसतन भार 150-200 ग्रा. के बीच होता है।  इस किस्म की औसत उपज 600 -750 कुंतल/हेक्टेयर  है।

स्वर्ण मणि

इस  किस्म की पत्तियां बैगनी रंग की होती है। भूमि से उत्पन्न जीवाणु मुरझा रोग के लिए सहिष्णु किस्म है। फल गोल एवं गहरे बैंगनी रंग के होते हैं। इसकी औसत उपज 600-650 कुंतल/हेक्टेयर  है।

अन्य किस्में- गोलफल- पूसा अंकुर, टी- 3, पूसा बिंदु, पूसा हाइब्रिड-9 पूसा हाइब्रिड- 6 आदि।

लम्बे फल- पंत सम्राट, पंजाब सदाबहार, पूसा हाइब्रिड- 5, पूसा क्रांति।

संकर किस्में- पूसा हाइब्रिड- 5, पूसा हाइब्रिड- 6, पूसा हाइब्रिड- 9,  अर्का नवनीत।

नर्सरी ओर रोपण का समय- कृषि जलवायु की विशिष्टता के आधार पर क्षेत्र के अनुसार बीज बुवाई ओर रोपण का समय अलग हो सकता है। पौध के विकास के लिए 25 डिग्री सेल्सियस तापक्रम उत्तम होता है।

उत्तरी क्षेत्र में- शीत ऋतु में जून से जुलाई माह बसंत की ऋतु की फसल के लिए नवम्बर माह में बुवाई।

पर्वतीय क्षेत्र- मार्च-अप्रैल माह।

देश के अन्य भाग- जून से सितंबर माह।

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बैगन की नर्सरी तैयार करना- 

    पानी की निकासी वाली भूमि व पौधशाला ऐसे जगह पर बनानी चाहिए जहां पानी का स्रोत नजदीक हो। एक हेक्टेयर भूमि के लिए 50 वर्ग मीटर की पौध पर्याप्त होती हैं। जिस भूमि पर नर्सरी लगानी है उसे 4 से 5 बार गहरी खुदाई करके आवश्यकता अनुसार लम्बी व 75 सेमी चौड़ी तथा 20 सेमी ऊंची क्यारियों का निर्माण करना चाहिए। दो क्यारियों के बीच मे 30 सेमी जगह छोड़नी चाहिए जो सिंचाई व जल निकासी तथा पौध को उखाड़ने में सहायक होती हैं। क्यारियों में कम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद अच्छी तरह से मिलाकर ओर बीज बुवाई से पहले बीज उपचार करके बुवाई करनी चाहिए। बीज की बुवाई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 5-6 सेमी व बीज को बुवाई के बाद 1सेमी मोटी परत मिट्टी की बिछा देनी चाहिए।

पौध रोपण- 

    पौधशाला से पौध निकलने के एक दिन पहले सिंचाई कर देनी चाहिए जिससे पौध उखाड़ते समय आसानी से पौधे उखड़ जाएं।  लम्बे बैगन के पौध से पौध की दूरी 60 सेमी व पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सेमी तथा गोल बैगन के लिए पौध से पौध की दूरी 60 सेमी व पंक्ति से पंक्ति की दूरी 75 सेमी रखनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण- 

    जैविक विधि से उत्पादन करने के लिए 50 से 60 दिन के बीच 3 से 4 निराई करनी चाहिए। पलवार करने के लिए सुखी घास का प्रयोग करके भी खरपतवार से बचा जा सकता है

कीट एवं रोग नियंत्रण जैविक विधि से- 

आर्द्र गलन (डैम्पिंग ऑफ)- यह रोग फफूंदी जनित पौधशाला का प्रमुख रोग है। इस रोग का प्रकोप दो अवस्थाओं में होता है। पहली अवस्था मे पौधे भूमि की सतह से बाहर आने से पहले ही मर जाते हैं दूसरी अवस्था मे अंकुरण के बाद जमीन की सतह से ही पौधे गलकर नष्ट हो जाते हैं।

जैसिडस- इस कीट का रंग हरा होता है यह पत्तियों की निचली सतह से रस चूसकर पत्तियों में जाले (छन्नी जैसे) बना देता है। इस कीट के अधिक प्रकोप होने से पौधे मर जाते हैं और फसल को बहुत ज्यादा नुकसान होता है।

एपिलेकना बीटल- पौधे की प्रारंभिक अवस्था मे यह कीट पौधे की पत्तियों को छलनी के समान बना देते हैं। जिससे पौधे की वृद्धि रुक जाती है।

वर्टिसिलियम विल्ट- यह रोग बैगन के पौधों को संक्रमित कर पौधे बोने रह जाते हैं। जड़ की गांठ छोटी हो जाती है जिससे पौधे की वृद्धि और विकास रुक जाता है। संक्रमित पौधे पर फूल और फल नही लगते हैं तथा विकृत फूलों की कलियों तथा विकृत फलों का विकास होता है।

फल सड़न- बैगन की फसल में अधिक नमी होने के कारण इस रोग का प्रभाव होता है। फल के ऊपर पानी से भरा जख्म बनता है। संक्रमित धब्बा बढ़ता है तो फलों से रुईं जैसे पदार्थ निकलता है।

लिटिल लीफ- बैगन की फसल के लिए यह गम्भीर वायरल रोग लीफ हॉपर के द्वारा फैलाया जाता है। संक्रमण के प्राम्भ में पत्ते हल्के पीले होते हैं। पत्तों का आकार छोटा और विकृत हो जाता है। पौधा बोना तथा कई कलियां डण्ठल तथा पत्तों के बीच के भाग में निकलते हैं और शाखाओं पर गांठे बन जाती हैं।

वैक्टीरियल विल्ट-  भारी वर्षा के समय यह रोग पनपता है। इस रोग से ग्रसित पौधे के पत्ते कमजोर पड़ने के कारण पौधे सूख जाते हैं। पीलेपन ओर मुरझाने तथा कुछ शाखाओं या पूरे पौधे के सूखने के लक्षण होते हैं। यह रोग मिट्टी में जन्मे जीवाणुओं के कारण होता है।

रोकथाम या नियंत्रण- 

1- उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए। बैगन की फसल जिस खेत मे पिछली फसल लगी हो उस खेत मे दुबारा बैगन की फसल नही लगानी चाहिए।

2- पुराने फसल अवशेष नष्ट कर देने चाहिए।

3- ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से या पंचगव्य से बीज शोधन करना चाहिए।

4- 25 किलो गोबर की अच्छी तरह से सड़ी हुई खाद में 2.5 किलो ट्राइकोडर्मा अच्छी तरह से मिलाकर छायादार स्थान पर गीले बोरी से 20 से 25 दिन ढककर रखना चाहिए। इस खाद को खेत मे डाले जाने वाले गोबर के साथ मिलाकर खेत मे अंतिम जुताई के समय मिला देना चाहिए।

5- खेत मे जल निकासी का उचित प्रबंधन हो।

6- अंतिम जुताई के समय गोबर की खाद के साथ 2 कुन्तल नीम की खली मिला देनी चाहिए।

7- रोग प्रतिरोधी किस्मों के चयन।

8- मक्का की फसल को खेत के बाहरी हिस्से में 3 से 4 लाइन में बोना चाहिए।

9- कीट पतंगों की रोकथाम के लिए प्रकाश प्रपंच या पीली चिपचिपी प्लेटों का प्रयोग करना चाहिए।

10- 1 लीटर पानी मे 25 मिलीलीटर नीम के तेल का छिड़काव  10 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।

11- बैगन की फसल में जीवामृत का छिड़काव 3 से 4 बार सायंकाल के समय करना चाहिए।

फल की तुड़ाई- उचित आकर के फल बनने पर उनकी तुड़ाई दिन के समय करनी चाहिए और छायादार स्थान पर उन्हें रखकर पानी से सॉफ् धोना चाहिए।

औसत उपज (पैदावार)-  जैविक विधि से उत्पादन भूमि की उर्वरा शक्ति व उनकी देखभाल पर निर्भर है । जैविक विधि से उत्पादन करने पर 250 से 400 कुन्तल/हेक्टेयर व रसायनों का प्रयोग करने पर 600-650 कुन्तल/हेक्टेयर तक प्राप्त होती है।

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