Minimum Support Price-न्यूनतम समर्थन मूल्य

WHAT IS MSP, किन फसलों का समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है, न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण कोन करता है, पहली बार किस फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य
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न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price)


कृषि सुधार बिल 2020 संसद के दोनों सदनों में पारित होने के बाद देश मे एक नई बहस छिड़ी है जो कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर है। न्यूनतम समर्थन मूल्य किसे कहते हैं? न्यूनतम समर्थन मूल्य को कौन घोषित करता है? न्यूनतम समर्थन मूल्य किन किन फसलों पर घोषित किया जाता है? न्यूनतम समर्थन मूल्य से सम्बंधित सवालों के जबाब इस लेख में आपको पढ़ने को मिलेंगे।

    किसान आंदोलन आजादी से पूर्व में किसानों का मनोबल किस तरह से साहूकारों ओर जमीदारों के द्वारा तोड़ा गया था का इतिहास देखना है तो श्री मुंशी प्रेमचंद जी के द्वारा लिखी गयी कहानियों मे किसानों की दशा और मनोस्थिति को सबसे अच्छे तरीके से समझा जा सकता है। आजादी से पूर्व किसान ओर कृषि कार्यों को प्रोत्साहन देने के लिए कोई भी कानून या योजनायें नही थी। जिसमे मुख्यतः किसान की उपज का मूल्य और किसान पर करों का बोझ मुख्य रूप से किसान को हतोत्साहित करने वाला मुख्य कारण रहा है।

    किसान को अनाज उत्पादन के बाद सही मूल्य मिले जिससे कि किसान की आर्थिक स्थिति समृद्ध हो सके। किसानों की दशा को सुधारने के लिए सरकारों द्वारा घोषणाएं ओर वायदे किये गए पर किसान की असल स्थिति में सुधार नही हो पाया। समय समय पर किसानों द्वारा आंदोलन के माध्यम से देश की सरकारों को चेताया है पर हकीकत में किसान की दशा में गुणात्मक सुधार उस स्तर तक नही हो पाया जो अभीष्ट था।

        सरकार के द्वारा हर साल रबी ओर खरीफ की फसल के समय न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है जिससे किसान को  उचित दाम अपनी उपज के मिल सकें और उपज बिक्री बिक्री पर पूरे देश के किसानों को समान मूल्य मिले जिससे किसानों का शोषण न हो सके।

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    भारत के किसानों को उपज बिक्री  करने पर उचित मूल्य मिल सके के लिए श्री लाल बहादुर शास्त्री जी द्वारा 1 अगस्त 1964 में एक समिति बनाई इस समिति के द्वारा  अनाज के न्यूनतम ओर अधिकतम मूल्य तय करना था। 24 सितंबर 1964 को एल के झा, टी पी सिंह, बीएन आधारकर, एमएल दन्तवाल ओर एमसी चौधरी की समिति द्वारा भारत सरकार को अनाज के मूल्य निर्धारण सम्बंधित रिपोर्ट सौपीं गयी जिस पर केंद्रीय कृषि मंत्रालय और राज्य सरकारों से विमर्श करने के पश्चात श्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा 13 अक्टूबर 1964 को अनाज का समर्थन मूल्य तय कर दिया जो कि वर्तमान समय तक कि सरकारें हर सीजन पर कर रही हैं।



    पहली बार किस फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया गया था-  भारत सरकार द्वारा 24 दिसम्बर 1964 को अनाज मूल्य निर्धारण की मंजूरी मिलने पर भी इसे लागू नही किया जा सका। 19 अक्टूबर 1965 को केंद्रीय सरकार के सचिव बी शिवरामन ने 19 अक्टूबर 1965 को इसे अंतिम मंजूरी दी और इसके बाद सर्वप्रथम गेहूं कि फसल का न्यूनतम सर्मथन मूल्य 1966-67 में घोषित किया गया।

न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण कोन करता है-

न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण कृषि लागत एवं मूल्य आयोग  (C.A.C.P.=Agriculture Cost And Price Commission)  जो किसान कल्याण मंत्रालय का एक अंग है के द्वारा खरीफ एवं रबी की फसलों की बुवाई से पूर्व किया जाता है। किसानों को बिचौलियों के शोषण से बचाकर किसानों के द्वारा उत्पादित कृषि उत्पाद को कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की   स्थापना का मुख्य उद्देश्य  है।    खाद्य मूल्य नीति समिति 1964 की सिफारिश पर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की स्थापना जनवरी 1965 में मूल्य आयोग के रूप में हुई थी। 1985 संस्था के नाम का संशोधन करते हुए इसमें ‘लागत’ शब्द भी जोड़ दिया गया ओर इसे कृषि लागत एवं मूल्य आयोग का नाम दिया गया।

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इन फसलों का समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है-

गेहूं, धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, जौ, जई, ओर सात तेल सरसों, मूंगफली, शीशम, सूरजमुखी, नाइजर सीड,  ओर सोयाबीन,  (पांच दाल) अरहर, मसूर, मूंग, चना, उड़द ओर चार व्यापारिक फसल- कपास, जुट ओर गन्ना ये 23 फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंतर्गत आती हैं ओर इन फसलों का ही सरकार के द्वारा  न्यूनयम  समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है।

एमएसपी यानी कि न्यूनतम समर्थन मूल्य क्या है (WHAT IS MSP)

        Minimum Support Price जिसे न्यूनतम समर्थन मूल्य कहते हैं । मिनिमम सपोर्ट प्राइस (Minimum Support Price) दर किसान को फसल के न्यूनतम लाभ के लिए सुरक्षा प्रदान करने का काम करती है |  एमएसपी की घोषणा भारत सरकार के द्वारा कुछ निश्चित फसलों के लिए बुवाई के मौसम में शुरुआत में की जाती है जो किसानों को उनकी फसल पर उपलब्ध करवाया जाता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के माध्यम से किसानों की फसलों की कीमत खुले बाजार में कम होने पर भी उनकी उपज को सरकार के द्वारा पूर्व में निर्धारित मूल्य पर ही खरीद किया जाता है। इससे किसान की उपज के मूल्य में कोई उतार चढ़ाव नहीं आता है। मण्डी  समिति /बाजारों में फसलों की कीमत कम या ज्यादा होने पर किसानों पर कोई प्रभाव ना पड़े । 

    बाजार में उपज के मूल्य में चल रहे उतार चढ़ाव का असर सबसे ज्यादा असर किसान को होता है क्योंकि फसल को तैयार होने का समय लगभग हर स्थान पर एक ही होता है जिससे मंडी में आवक बढ़ने या घटने से उपज के मूल्य में उतार-चढ़ाव रहता है इस समस्या से किसान सबसे ज्यादा परेशान रहता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होने से  किसानों को बड़ी राहत मिलती है । 

भारतीय किसानों की समस्या को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें -

उदाहरण - किसी  किसान द्वारा धान  फसल का उत्पादन किया गया और धान की फसल का उत्पादन अन्य क्षेत्रों में भी  पिछले वर्ष की अपेक्षा अधिक है।  मांग और पूर्ति के  नियम के आधार पर खपत कम और उत्पादन ज्यादा होने से उपज का मूल्य घटना स्वाभाविक है। इसका सबसे बड़ा कारण किसानों के पास भंडारण की सुविधा का न होना भी उपज को सीधे बाजार में उतारने के मजबूर होना है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) का उद्देश्य- न्यूनतम समर्थन मुख्य का मुख्य उद्देश्य किसानों द्वारा उत्पादित उत्पाद की बिक्री के समय बिचौलियों द्वारा किये जाने वाले शोषण को रोकना है।

किसान अपनी फसल को सबसे ज्यादा बिचौलियों को बेचता है। बिचौलियों द्वारा किसानों का शोषण संगठित तरीके से किया जाता है जिसका किसान को आभास भी नही होता। क्योंकि मांग और पूर्ति के नियम के अनुसार आवक ज्यादा होने पर वस्तु का  मूल्य कम होता है और आवक कम होने ओर खरीददार ज्यादा होने से वस्तु का मूल्य अधिक हो जाता है।

    कृषिगत उत्पाद की पैदावार का समय पूरे देश मे लगभग एक ही है। उत्पाद का एक समय तैयार होकर बाजार में बिक्री के लिये एक ही समय आने से बिचौलियों द्वारा उपज की कीमत कम तय की जाती है। क्योंकि किसान के पास उत्पादन के भंडारण के लिए पर्याप्त स्थान नही होता जिसके कारण मजबूरी में किसान को अपना उपज को बाजार में बेचना पड़ता है। 

    इस समस्या को देखते हुए सरकार द्वारा किसानों का शोषण न हो के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है। जिससे किसान को आर्थिक क्षति न हो और उपज का सही मूल्य मिल सके।

न्यूनतम समर्थन मूल्य के लाभ- 

    किसान की कोशिस हर समय यही रहती की उत्पादन पिछले समय की अपेक्षा अधिक रहे। उत्पादन वृद्धि के लिए अनेक तरह के उपाय किसान के द्वारा किये जाते हैं जिससे उत्पादन बढ़ता है और बाजार में अधिक उत्पादन आने से उत्पाद का मूल्य कम हो जाता है। किसान की सबसे बड़ी समस्या यही  है कि उत्पादन करने के बाद भी सही मूल्य नही मिल पाता और ज्यादातर उत्पादन लागत के बराबर भी मूल्य नही मिलने से किसान कर्ज के जाल में फंसकर आत्महत्या तक कर लेता है। इस समस्या के समाधान के  लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछ हद तक सक्षम है।

1- न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने उपज का न्यूनतम मूल्य तय हो जाता है जिससे किसान अपनी फसल के दाम गिरने के भय से मुक्त रहता है।

2- मण्डी/बाजार समिति में आवक बढ़ने से मूल्य कम होना आम है जिससे किसान को लागत के बराबर भी मूल्य न मिल पाना एक सबसे बड़ी समस्या है। जिन फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होता है उन फसलों को बेचने पर किसान को दाम में कमी का सामना आवक बढ़ने पर नही होता है।

3- भारत मे किसानों की उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिश पर न्यूनतम समर्थन मूल्य फसल बुवाई के समय तय किया जाता है। जिससे किसान को अपनी फसल की बिक्री का मूल्य पता रहता है।

कृषि लागत व मूल्य आयोग का मुख्यालय : इस आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। 

न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता हैं -

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग विभिन्न फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण करते समय 2009 में निर्धारित की गई विभिन्न शर्तो को ध्यान में रखती है जो निम्नलिखित है।

(A). बाजार में मांग एवं पूर्ति

(B). उत्पाद उत्पादन की लागत 

(C). उपभोक्ताओं पर न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रभाव

(D). स्थानीय एवं अंतर्राष्ट्रीय  बाजारों में मूल्य की प्रवृत्ति।

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