Potato production by organic method-जैविक विधि से आलू का उत्पादन

आलू की जैविक खेती कैसे करें , आलू की फसल में लगने वाले कीट व रोग तथा उनका जैविक विधि से निदान, आलू का भंडारण कैसे करें, आलू बुआई का समय
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 जैविक विधि से आलू का उत्पादन कैसे करें  

आलू की खेती हेतु जलवायु

आलू की खेती भारत में लगभग सभी राज्यों में की जाती हैभारत में आलू का उत्पादन सालभर जलवायु की  उचित भिन्नता के कारण होते रहता है जिससे की सबसे ज्यादा मांग वाली सब्जी की आपूर्ति निरंतर होती रहती है। आलू कि खेती से अधिक उत्पादन लेने के लिए ठन्डे मौसम की आवश्यकता होती है पाले  प्रभाव नहीं  होना चाहिए पौध की बढ़वार के लिए लम्बे दिन कंद निर्माण के लिए छोटे दिन होना  चाहिए  कंदों का निर्माण सबसे अच्छा 20 डिग्री सेल्सियस तापक्रम पर होता है जैसे जैसे तापक्रम में वृद्धि होती जाती है, वैसे ही कंदों का निर्माण में भी कमी होने लगती है पर्वतीय क्षत्रो में समुद्रतल  से  3300 मीटर  की ऊंचाई तक आलू की फसल  का सफलता पूर्वक उत्पादन किया जाता है


भूमि का चुनाव

आलू की फसल के उत्पादन के लिए मृदा का  पी एच मान 5.2 से 6.5 होना चाहिए उचित जल निकास वाली जीवांश पदार्थयुक्त बलुई दोमट मिटटी जो जो क्षारीय भूमि हो के अलावा सभी प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है जलनिकास की उचित व्यवस्था  जीवांश पदार्थ की कमी होने पर आलू के कंदों का विकास कम होता है  जल निकास होने पर आलू के कंद विकृत तथा अविकसित होता है

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खेत की तैयारी

खेत को 3 से 4  जुताई करके प्रत्येक जुताई  पाटा चला देना चाहिए जिससे मिटटी भुरभुरी हो जाये क्योंकि आलू के कंद मिटटी के अन्दर तैयार होते है इसलिए मिटटी का भुरभुरा होना आवश्यक है  बुवाई के समय मिटटी में नमी का पर्याप्त होना अनिवार्य है खेत की तैयारी के समय 25- 30 टन प्रति हेक्टेयर कमोस्ट खाद याअच्छी तरह से सड़ी  गोबर की खाद को मिटटी में अच्छी तरह बीज बुवाई के 30 दिन पहले मिलाना चाहिए

कार्बनिक खाद

आलू की फसल के लिए कार्बनिक खाद का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसके कंद भूमि के अंदर बनते है और मृदा में कार्बनिक पदार्थ की कमी के कारण आलू उत्पादन  स्तर न्यून हो जाता है। खेत में यदि हरी खाद का प्रयोग किया हो तो 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर की खाद/ कम्पोस्ट खाद का और कार्बनिक पर्दाथों की मृदा में उचित मात्रा बनी रहे इसके लिए  जंगल में पुराने पेड़ों की जड़ों के आसपास की ऊपरी सतह की मिटटी का प्रयोग समय समय पर खेत में करना चाहिए।

बुआई का समय-

अगेती फसल                                              15 सितम्बर से 10 अक्टूबर तक

मुख्य फसल-                                                  20 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक

बसंतकालीन फसल-                                       25 दिसम्बर से 10 जनवरी 

मध्य पर्वतीय क्षेत्र  800 -1600 मीटर) -         मध्य जनवरी

ऊँचे  पर्वतीय क्षेत्र  (1600 -2400 मीटर) -       मार्च- अप्रैल

अधिक ऊँचाई के पर्वतीय क्षेत्र  (2400 मीटर से अधिक ) -  अप्रैल अंतिम सप्ताह से मई माह तक

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आलू की उन्नत किस्में

अगेती किस्में- कुफरी पुखराज, कुफरी अशोका, कुफरी जवाहर, कुफऱी चंदरमुखी, कुफरी अलंकार इन प्रजातियों की फसल 80 से 100 दिन  में तैयार हो जाती है 

मध्यम समय वाली किस्में- कुफरी चिप्सोना- 1, कुफरी चिप्सोना- 3,  कुफरी चिप्सोना- 4,  कुफरी सदाबहार, कुफरी ज्योति, कुफरी पुष्कर, कुफरी बादशाह इन प्रजातियों की फसल 90 से 110 दिन में तैयार हो जाती है

देर से पकने वाली किस्में- कुफरी सिदूँरी, कुफरी बादशाह, कुफरी फ़्राईसोना,  इन प्रजातियों की फसल  110 से 120 दिन में तैयार हो जाती है

संकर किस्मे- 

कुफरी अशोक P 376

कुफरी संतुलज J 5857 

कुफरी जवाहर JH 222 90-110

पर्वतीय क्षेत्र के किसान के लिए सलाह पर्वतीय क्षेत्रों के लिए बीज तैयार करने वाले संस्थान से अनुमोदित प्रजाति के बीज किसी विश्वसनीय प्रतिष्ठान से ही खरीद करें या अपना पारम्परिक बीज का ही प्रयोग करें पारम्परिक बीज यहां की जलवायु के  अनुकूल होता है मैदानी क्षेत्र में तैयार बीज पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु के अनुकूल नहीं होता है जिससे किसान को नुकसान होता है


बीज का चयन

आलू बीज चयन आलू की खेती का मुख्य आधार होता है क्योंकि आलू की खेती का लगभग 50  प्रतिशत खर्च आलू के बीज खरीद पर लगता है शुद्ध किस्म का चयन, जलवायु के अनुकूल, बीज की रोगप्रतिरोधी क्षमता देखकर ही बीज खरीद करना चाहिए। स्वस्थ  तथा सुडोल बीज ही बुवाई में प्रयोग करने चाहिए उत्पादन के लिए आलू बीज की किस्म और भूमि की उपज  का स्तर फसल प्रबंधन आदि कारक जोखिम हैं जिनका समाधान समय से करके अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है | आलू की खेती हेतु 30 ग्राम से 125 ग्राम तक वजन कंद होना चाहिए

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अगेती फसल लेते समय भूमि में नमि अधिक होती है इसलिए आलू के बीज को काटकर नहीं लगाना चाहिए पूरा आलू बीज में प्रयोग करना चाहिए, खेत की मिटटी में उपस्थित नमी के कारण आलू बीज के कटे टुकड़ों के  सड़ने  की संभावना ज्यादा होती है देर से बोये जाने वाले आलू में बड़े आलू को टुकड़ों में काट लेते हैं, एक टुकड़ें में कम-से-कम 2 से 3 आँखें रहनी चाहिये

आलू बीज की सुसुप्तावस्था को तोडना जरूरी होता है इसके लिए बीज को  एक जगह ढेर लगाकर जहां का तापमान वातावरण के तापमान से अधिक हो में रखकर जुट की बोरी से ढककर रखते हैंआँख में हल्के अंकुर आने के बाद ही बीज की बुवाई करनी चाहिए

खरपतवार नियन्त्रण

आलू की फसल में  3-4  निराई- गुड़ाई हाथ से करनी चाहिए। बसंतकालीन फसल के समय  निराई गुड़ाई खरपतवार जमाव के अनुसार बढ़ सकती हैं। पहली निराई गुड़ाई  बीज बुवाई के लगभग 30  दिन बाद जब अंकुरण के 75 प्रतिशत हो जाने पर करनी चाहिए दूसरी निराई जब पौधे 15 से 20 सेंटीमीटर के हो तो निराई गुड़ाई करते समय पौधों पर मिटटी भी चढ़ा देना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन -

पौधों कंदों के  उचित वृद्धि एवं विकास  के लिए 5-6 सिंचाई की आवश्यकता होती है। यदि आलू की बुआई खेत की नमी के आधार पर की गयी हो अर्थात बीज बुवाई से पूर्व पलेवा नहीं किया गया है तो बुआई के 2-3 दिन के अन्दर हल्की सिंचाई करनी चाहिए। उत्पादन का स्तर अच्छा हो के लिए अंकुरण से पूर्व बलुई दोमट दोमट मृदाओं में बुआई के 8-10 दिन बाद तथ भारी मृदाओं में 10-12 दिन बाद पहली सिंचाई करें। पाला पड़ने की संभावना जिन क्षेत्रों में हो तो फसल में सिंचाई अवश्य करें।

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आलू की फसल पर लगने वाले कीट व रोग उनकी रोकथाम-
कीट-

जैविक पद्धति से फसल उत्पादन करने पर किसी भी रासायनिक कीटनाशी या रोगनाशी का प्रयोग नहीं करना चाहिये|  रोगों कीटों का  नियंत्रण कृषकों को  शस्य क्रियाओं से जैविक पदार्थों के प्रयोग से  करना चाहिए |

माहू - पत्तियों तनों का रस चूस कर यह कीट पौधे को  क्षति पहुँचाता है| प्रकोप होने पर पत्तियाँ पीली पड़ कर गिर जाती हैं एवं यह मोजैक रोग का  प्रसारण भी  करता है |

चेंपा- कीट के बच्चे व प्रौढ़  पत्तों से रस चूसकर व विषाणु रोग फैला कर फसल को हानि पहुंचाते हैं। पत्ते पीले होकर मुड़ जाते हैं।

आलू का पतंगा- इस कीट का वयस्ककीट आलू की आँखों में अण्डा देता है| जिनसे 15 से 20 दिन बाद सूड़ियाँ निकलती हैं|  सूड़ियाँ कन्दों में घुसकर कंद को क्षति पहुँचाती हैं| यह कीट आलू के कन्दों और भण्डारण में  क्षति पहुँचाता है|

हरा तेला-आलू की फसल का  यह मुख्य कीट है। इस कीट के शिशु व प्रौढ़ का रंग हरा होता है जो पौधे की  कोमल पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं जिससे पत्तियां पीली पड़कर मुड़ जाती हैं और अंत में किनारों से सूख जाती हैं। फसल बौनी रह जाती है तथा जली हुई दिखाई देती है।

आलू की फसल में कीट नियंत्रण

1 - फसल की बुवाई  के लिए स्वस्थ आलू बीज का प्रयोग करें।

2 -  नीम ऑयल 3 मि.ली./लीटर किसी तरल डिजर्जेंट या बर्तन धोने में प्रयुक्त होने वाले लीकविड साबुन को मिलाकर खेत में छिड़काव करें।

3 - आलू भूमि से बाहर न दिखाई दें के लिए आलू की मेढ़ों पर मिट्टी पूरी तरह चढ़ाएं।

4 -  भृगों व सुंडियों को शाम के समय रोगग्रस्त पौधों से इकट्ठा करें तथा उन्हें खेती की भूमि से दूर ले जाकर निस्तारण करें।

5 - बीज का उपचार बीजामृत व ट्राईकोडर्मा से करें व उपचारित बीज को छाया में सुखाकर बुवाई करें।

6 - प्रकाश प्रपंच का प्रयोग करें । ट्रेप बोर्ड का इस्तेमाल किया जाता है तो बोर्ड की सतह चिपचिपी होनी चाहिए।

झुलसा रोग

जब वातावरण का तापमान 10-20 डिग्री सेल्सियस हो, आर्द्रता 80 प्रतिशत से अधिक हो, बदली छायी रहे तथा रूक-रूक कर बूॅदाबादी पड़ रही हो या कोहरा छाया हो तो इस रोग का फैलाव तीव्रता से होता है।

आलू की  फसल में दो तरह का झुलसा रोग आता है अगेती झुलसा दिसंबर महीने की शुरुआत में लगता है जिसके कारण पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं, जिनमें बाद में चक्रदार रेखाएं दिखाई देती है।  अगेती झुलसा के प्रभाव होने पर आलू छोटे कम बनते हैं। 



 पछेती झुलसा का प्रभाव दिसंबर के अंत से जनवरी के शुरूआत में होता है।  पछेती झुलसा आलू की फसल  के लिए ज्यादा नुकसानदायक होता है। वातावरण में बदलाव से होने वाले रोग के कारण बहुत कम समय 5 -10 दिन  में ही फसल  नष्ट हो जाती है। पछेती झुलसा लगने पर पत्तों के ऊपर काले-काले चकते  बनते  हैं जो बाद में बढ़कर पत्तियों और पौधे को नष्ट कर देतें हैं।

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रोग नियंत्रण -

1 - स्वस्थ व रोग रहित बीज का प्रयोग करें।

2 - प्रमाणित बीज ही प्रयोग करना चाहिए ।

3- रोग प्रतिरोधी किस्म जैसे कि कुफरी स्वर्ण, कुफरी ज्योति का प्रयोग  करें।

4 - वूवेरिया बेसियाना का  घोल  200 लीटर पानी में 2 कि.ग्रा. वूवेरिया बेसियाना  पाउडर को मिलाकर पत्तों पर छिड़काव करें।

5 - बीज  को ट्राईकोडर्मा तथा बीजामृत से उपचार करें।

6 -  अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद डालनी चाहिए।

7 - आलू, मिर्च,  बैंगन,  टमाटर फसलों को एक साथ नहीं बोना चाहिए।

8- पाले के प्रकोप से बचने के लिए खेत में हल्की सिंचाई करनी चाहिए।

9- खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।

आलू की फसल खुदाई

आलू की फसल तैयार होने पर पौधे को जमीन से ऊपर 7 -10 दिन पहले काट देना चाहिए खेत में अधिक सूखा और अधिक नमी नही होनी चाहिए।

आलू का भंडारण

आलू का भंडारण पारम्परिक रूप गढ्ढा  खोदकर जिसमे गढ्ढे की निचली सतह में रेत  की परत बिछा देते हैं व गढ्ढे को बंद करते समय सूखी पत्तियों को रखकर पॉलीथिन से ढकते हैं गढ्ढे को ऊँची जमीन पर बनाना चाहिए जिससे की जलभराव की समस्या न हो।

किसी भंडार में यदि आलू का भंडारण किया जा रहा हो तो फर्श पर रेत बिछाकर आलू की ढेर बनाये फिर इस ढेर के ऊपर सुखी पत्तियां रखकर रेत की दो इंच मोती परत बना दें।

आलू का औसत उत्पादन

सामान्य किस्म - 200 - 250  कुंतल प्रति हेक्टेयर व संकर किस्म 300 - 350  कुंतल प्रति हेक्टेयर

 जैविक विधि से टमाटर की खेती कैसे करें की जानकारी के लिए इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें

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