Indian Farmer Movement - Before Independence-भारतीय कृषक आंदोलन- आजादी से पूर्व

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 भारतीय कृषक आंदोलन- आजादी से पूर्व 

(Indian Farmer Movement - Before Independence)

    किसानों की समस्या आजादी से पहले  अंग्रेजों द्वारा अपने जमीदारों के माध्यम से ऋण वसूली करके कर के कुचक्र में किसानों को फंसा कर साहूकारों और जमीदारों के द्वारा शोषित किया जाना रहा है। जमीदारों के किसान पर किये गए अत्याचारों की भीभत्सा जानने के लिए श्रद्धेय मुंशीप्रेमचन्द जी  के उपन्यासों से उस समय के किसानों  दुर्दशा पर लिखे गए लेख पढ़कर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है, कि किसान की स्थिति क्या थी। वह जमीदारों के अन्याय के खिलाफ विद्रोह क्यों नहीं कर पा रहा था। उसका कारण किसान को अपने सम्मान को बचाने के लिए अपनी सहजता और सरलता जो की अन्याय के खिलाफ लड़ने से रोकती थी। यह कारण मुख्य अन्याय को सहन करने का रहा है

    अंग्रेजो  के विरोध में 1857  की क्रांति जिसे प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा जाता है। इस आंदोलन के असफल होने का  कारण अंग्रेजों द्वारा देशी रियासतों के माध्यम से आंदोलन को दबाना रहा है। इस असफल प्रयास के कारण  किसानों द्वारा 1859 में मोर्चा संभाला गया। देशी और अंग्रेजी रियासतों द्वारा किसानो का शोषण करना और देश और मातृभूमि को आजाद करने के  बीच अनेकों स्थानों पर एक के बाद एक कई किसान आंदोलन हुए, जिनमें  नील पैदा करने वाले किसानों का विद्रोह, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह और मोपला विद्रोह प्रमुख किसान आंदोलन के रूप में जाने जाते हैं। इसके पश्चात 1918 का खेड़ा सत्याग्रह गांधीजी द्वारा किया गया 1920 में शुरू हुए  असहयोग आंदोलन की ज्वाला उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र तक पहुंची जिसमे 1921 में कुली बेगार प्रथा के खिलाफ किसानों ने बिगुल फूंका। इस आंदोलन से अंग्रेज सरकार इतनी बोखला गयी थी  कि उन्होंने दशज्यूला के 72  गावों को 10 नंबर की सूचि में डाल  दिया सरकारी सहायता बंद कर दी पर स्वाभिमानी किसानों द्वारा माफ़ी नहीं मांगी गयी।

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     भारतीय इतिहास में अंग्रेज अधिकारीयों द्वारा जमीदारों से भूमि लेकर बिना किसी मेहनताना दिए किसानो को खेत में काम करने के लिए विवश किया जाता था। किसान से कम दाम पर नील उत्पाद लेने के लिए इकारनामा लिखा जाता था और अग्रिम देकर काम करने के लिए विवश किया जाता था। जिससे जमींदार और साहूकारों के चुंगल में किसान आकर प्रतिशोध नहीं कर पता था। इस प्रथा को ददनी प्रथा कहा जाता है।  इस तरह के अत्याचारों से परेसान होकर किसानो द्वारा सन 1859 -1860  में  भारतीय किसानों द्वारा ब्रिटिश  नील उत्पादकों के खिलाफ बंगाल में आंदोलन किया गया जो इतिहास में सबसे सफलतम और व्यापक प्रभाव वाला आंदोलन कहा जाता है। इस आंदोलन की विशालता और प्रभावशीलता को देखते हुए 1859 में बेदखली और लगान वृद्धि के लिए सरंक्षण किसानो को एक्ट बनाकर ब्रिटिश सरकार  द्वारा  संतुष्ट करने का प्रयास किया गया था, पर जमीदारों द्वारा लगान की कीमत कम करने के कारण किसानों की  जमीन को पूर्ववत हड़पना जारी रखा। जमीन हड़पने और किसान को जमीन से बेदखल करने के साथ-साथ लगान की बढ़ी हुई रकम के विरोध में 1873  में पाबना के किसानों द्वारा कृषक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कृषक संगठन बनाया गया। जो किसान के अधिकारों को आधिकारिक रूप से न्याय दिलाने में मददगार हो सके।

    आजादी से पूर्व किसानों द्वारा किये गए आंदोलन

1-       नील आंदोलन - अपनी आर्थिक माँगों के सन्दर्भ में किसानों द्वारा किया जाने वाला यह आन्दोलन उस समय का एक विशाल आन्दोलन था। सन 1859 -1860 में बंगाल के किसानों  द्वारा ब्रिटिश नील उत्पादकों के ख़िलाफ़ यह आंदोलन किया गया। उस समय "ददनी प्रथा" जिसमे अंग्रेजी हुकूमत द्वारा बंगाल तथा बिहार के ज़मींदारों से भूमि लेकर बिना पैसा दिये ही किसानों को नील की खेती में काम करने के लिए विवश किया जाता था। नील उत्पादक किसानों को एक मामूली सी रक़म अग्रिम देकर उनसे करारनामा लिखा लेते थे, जो बाज़ार भाव से बहुत कम दाम पर हुआ करता था। इस प्रथा को 'ददनी प्रथा' कहा जाता था।

2-       पाबना विद्रोह - 1873  से 1876  में  पाबना विद्रोह हुआ था सन 1859 में किसानों को अंग्रेज सरकार द्वारा एक  एक्ट बनाकर जमीदारों के द्वारा किसानों की बेदख़ली एवं लगान में वृद्धि के विरुद्ध एक सीमा तक संरक्षण देने के लिए किसानो को  प्राप्त हुआ था। एक्ट बनने के बाद भी  ज़मींदारों ने किसानों से तय सीमा से अधिक लगान वसूला एवं किसानों को उनकी ज़मीन के अधिकार से वंचित किया। ज़मींदार को ज़्यादती का मुकाबला करने के लिए 1873 . में पाबना के युसुफ़ सराय के किसानों ने मिलकर एक 'कृषक संघ' का गठन किया। जिसका मुख्य कार्य किसानों के हित के लिए आधिकारिक रूप से लड़ना था।

3-      दक्कन का विद्रोह- दक्कन विद्रोह मुख्यतः मराठा किसानो द्वारा सूद पर पैसे देने वाले साहूकारों के खिलाफ 1874 -1879  में अहमदाबाद, सतारा, और शोलापुर आदि क्षेत्र में मुख्यरूप से फैला और भारत के दक्षिण तक यह आंदोलन की आग लगी।  

    दक्कन विद्रोह के मुख्य कारण -

    () - साहूकारों और जमीदारों अनाज के व्यापारियों द्वारा किसानों का शोषण - सूदखोर और साहूकारों द्वारा किसानो पर किये गए बेहिसाब अत्याचारों जिनमें मुख्य रूप से गिरवी रखकर उधार लेना सूदखोरों और साहूकारों का कभी समाप्त होने वाला कर्ज जिसमे किसान की जमीनों को हड़पने  के खिलाफ यह आंदोलन महाराष्ट्र के पूना एवं अहमदनगर जिलों में गुजराती एवं मारवाड़ी साहूकार जो सारे हथकंडे अपनाकर किसानों का शोषण कर रहे थे के खिलाफ था।

    () - भूमिकर में बढ़ोतरी - सन 1963 -65 तक अमेरिका के गृह युद्ध के कारण भारतीय किसानों की कपास की उपज का निर्यात नहीं हो पाया। जिसके कारण किसानों की आर्थिक स्थिति बिगड़ती रही और ब्रिटिश सरकार के द्वारा भूमि कर को कम नहीं किया गया।

4- उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन- होमरूल लीग के कार्यकताओं तथा गोरीशंकर मिश्र , इन्द्रनारायण द्विवेदी तथा  मदन मोहन मालवीय के दिशा निर्देशन के परिणामस्वरूप फरवरी, सन् 1918 में उत्तर प्रदेश में 'किसान सभा' का गठन किया गया। सन् 1919 के अं‍तिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आया। उत्तरप्रदेश के किसान आंदोलन को 1920 के दशक में सर्वाधिक मजबूती मिली 17  अक्टूबर 1920 में प्रतापगढ़ जिले में "अवध किसान सभा" का गठन किया गया  । उत्तर प्रदेश के हरदोई, बहराइच एवं सीतापुर जिलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर अवध के किसानों ने 'एका आंदोलन' नामक आंदोलन चलाया।

5-       मोलपा विद्रोह - सन 1920  में  मोपलाओं द्वारा केरल के मालाबार क्षेत्र में विद्रोह  किया गया। प्रारम्भ में यह विद्रोह अंग्रेज़ हुकूमत के ख़िलाफ़ॅ था। 15 फ़रवरी, 1921 ई. को सरकार ने निषेधाज्ञा लागू कर  याकूब हसन, यू. गोपाल मेनन, पी. मोइद्दीन कोया और के. माधवन नायर को गिरफ्तार कर लिया। इन खिलाफत और कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी के बाद मोलपा विद्रोह आन्दोलन स्थानीय मोपला नेताओं के हाथ में चला गया। 1920 ई. में इस आन्दोलन ने हिन्दू-मुसलमानों के मध्य साम्प्रदायिक आन्दोलन का रूप ले लिया परन्तु शीघ्र ही इस आन्दोलन को कुचल दिया गया।

6-       कुली बेगार प्रथा के खिलाफ आंदोलन – 1920 में गाँधी जी द्वारा अंग्रेजों  खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाया। जिसके परिणाम स्वरूप उत्तराखंड में कुली बेगार प्रथा जो अंग्रेजो द्वारा अपने घूमने फिरने के शोक के कारण स्थानीय लोगों को उनका समान एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना था के खिलाफ किसानों के द्वारा आंदोलन किया गया। गढ़वाल क्षेत्र के ककोड़ाखाल में किये गए आंदोलन में तत्कालीन ब्रिटिश डिप्टी कमिश्नर पी मेशन  और उसकी पत्नी को जान बचाकर भागना पड़ा था। इस आंदोलन से आहत होकर अंग्रेजों ने दशज्यूला के 72 गाँवों  को सरकारी मदद न मिले के लिए सभी सुविधाएँ बंद कर दी थी पर स्वाभिमानी किसानों के द्वारा माफ़ी नहीं मांगी गयी।

7-       कूका विद्रोह- कूका विद्रोह के लिए बनाये गए संगठन के संस्थापक भगत जवाहरमल थे। इस विद्रोह का कारण अंग्रेज सरकार द्वारा बनाएं गए कृषि के खिलाफ कानूनों से हुई समस्याओं के खिलाफ अंग्रेज़ सरकार से संगठन के माध्यम से लड़ना था। कूका विद्रोह के संस्थापक भगत जवाहरमल के शिष्य बाबा रामसिंह ने 1872 में  अंग्रेजों का सामना किया। जिसके कारण  उन्हें कैद कर रंगून  भेज दिया गया।

8-       रामोसी किसानों का विद्रोह- जमीदारों के अत्याचार के विरुद्ध महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में रामोसी किसानों के द्वारा  जमींदारों के विरुद्ध विद्रोह किया। औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सीताराम राजू के नेतृत्व में आंध्रप्रदेश में यह विद्रोह सन् 1879 से लेकर सन् 1920-22 तक हुआ।

9-       ताना भगत आंदोलन- लगान  की ऊँची दर और चौकीदारी कर से परेशान होकर सन् 1914 में बिहार में इस आंदोलन की शुरुवात हुई  इस आन्दोलन के प्रवर्तक 'जतरा भगत' थे  'मुण्डा आन्दोलन' की समाप्ति के करीब 13 वर्ष बाद 'ताना भगत आन्दोलन' शुरू हुआ। यह एक धार्मिक आन्दोलन था जो  आदिवासी जनता को संगठित करने के लिए नए 'पंथ' के निर्माण का आन्दोलन था।

10- अखिल भारतीय किसान सभा-   अखिल भारतीय किसान संगठन का निर्माण सभी प्रांतीय किसान सभाओं का एकीकरण करके हुआ उससे पूर्व  अलग अलग प्रांतीय संगठन बने जिसमें  सहजानंद सरस्वती ने सन् 1923 में  'बिहार किसान सभा' का गठन किया। सन् 1928 में 'आंध प्रान्तीय रैय्यत सभा' की स्थापना एनजी रंगा ने की। उड़ीसा में मालती चैधरी ने 'उत्‍कल प्रान्तीय किसान सभा' की स्थापना की। बंगाल में 'टेंनेंसी एक्ट' को लेकर सन् 1929 में 'कृषक प्रजा पार्टी' की स्थापना हुई। अप्रैल, 1935 में संयुक्त प्रांत में किसान संघ की स्थापना हुई और 1935  में ही  अखिल भारतीय किसान संगठन की रूप रेखा तैयार की गयी ।

11- चम्पारण सत्याग्रह- किसानो को जमीन के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य होने के कारण चम्पारण का आंदोलन का जन्म हुआ।  चम्पारण के किसानों से अंग्रेज बागान मालिकों ने एक अनुबंध करा लिया था। जिसके अंतर्गत किसानो को 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था। जमीदारों और साहूकारों के चुंगुल में फसंकर किसानों द्वारा अपनी खेती को गिरवी रखा गया। जिससे किसान कभी न उभर पाने की स्थिति में आ गया था।

12-  खेड़ा सत्याग्रह-  गुजरात में खेड़ा नामक स्थान के किसानों की लगान की ऊँची दर की समस्या को लेकर गांधी द्वारा सन् 1918 में  आन्दोलन शुरू किया।  खेड़ा में गांधीजी ने अपने प्रथम वास्तविक 'किसान सत्याग्रह' की शुरुआत की। । गांधीजी ने 22 मार्च, 1918 को खेड़ा आन्दोलन की बागडोर संभाली।

अधिकतर किसान आंदोलनों में किसानों की लड़ाई के पीछे उद्देश्य व्यवस्था-परिवर्तन नहीं था, लेकिन इन आन्दोलनों की असफलता के पीछे किसी ठोस विचारधारा, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कार्यक्रमों का अभाव था।

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